शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

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गोकुल के संचालक गैरकानूनी? पूर्व मुख्य न्यायाधीश गवई ने क्या सलाह दी

सियासत PT24 राजनीति डेस्क

राज्य सरकार ने गोकुल में चार संचालक नियुक्त कर उन्हें मतदान का अधिकार दिया है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश भूषण गवई ने सलाह दी है कि यह अध्यादेश कानून की चौखट में नहीं टिकेगा।

राज्य सरकार ने गोकुल में चार संचालक नियुक्त किए हैं और उन्हें मतदान का अधिकार दिया है। इसके लिए सरकार ने अध्यादेश निकाला है। विपक्ष ने नाराजगी जताई है। विपक्ष का आरोप है कि यह अध्यादेश गैरकानूनी है और सरकार गोकुल को अपने कब्जे में लेना चाहती है।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का कहना है कि सरकार ने एडवोकेट जनरल से पूछकर ही फैसला लिया है, इसलिए यह कानून की चौखट में टिकेगा। वहीं पूर्व मुख्य न्यायाधीश भूषण गवई ने सलाह दी है कि यह अध्यादेश कानून की चौखट में नहीं टिकेगा। मामला कोर्ट में है, इसलिए देखना होगा कि क्या फैसला आता है।

कोल्हापुर जिला सहकारी दूध उत्पादक संघ यानी गोकुल में नए चुने गए बहुमत को सत्ता संभालने से रोकने के लिए सरकार अध्यादेश लाकर विशेषज्ञ और सरकारी स्वीकृत संचालकों को मतदान का अधिकार दे, तो वह कानून और संविधान की कसौटी पर नहीं टिकेगा, यह कानूनी सलाह गवई ने दी थी। उन्होंने कहा था कि ऐसा अध्यादेश मनमाने कामकाज और अधिकारों का दुरुपयोग माना जाएगा।

मुंबई हाई कोर्ट की कोल्हापुर सर्किट बेंच के वकील एड. श्रीकृष्ण गणबावले ने बहुमत वाले 13 निर्वाचित संचालकों की ओर से गवई से कानूनी सलाह मांगी थी। गवई ने 3 नवंबर 2026 को अपनी राय दी।

गवई ने कहा है कि धारा 73 अअअ और 27(9) के मुताबिक स्वीकृत और सरकार द्वारा नामित संचालकों को अध्यक्ष या दूसरे पदाधिकारियों के चुनाव में वोट देने का अधिकार नहीं है। उनके मुताबिक बहुमत का जनादेश नकारने के लिए अध्यादेश से यह अधिकार देना राजनीतिक मकसद से प्रेरित है और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।

मुंबई हाई कोर्ट ने रिट याचिका 5762/2026 में 2 नवंबर 2026 को आदेश दिया था कि 10 नवंबर 2026 को होने वाले अध्यक्ष चुनाव के लिए 25 निर्वाचित संचालकों को 7 दिन का नोटिस दिया जाए। गवई ने कहा है कि यह आदेश लंबित रहते अध्यादेश निकालना सीधे न्याय की प्रक्रिया में दखल देना होगा। उनके मुताबिक ऐसा कोई भी अध्यादेश हाई कोर्ट में चुनौती दिए जाने पर रद्द होने लायक होगा।

पेच क्या है? गोकुल के बायलॉज और नियमों के हिसाब से चेयरमैन चुनने के लिए 14 सदस्य चाहिए। सतेज पाटील के पास सिर्फ 13 सदस्य हैं, जबकि महायुति के पास 12 हैं। इसी वजह से चेयरमैन का चुनाव नहीं हो पा रहा। इस डेडलॉक को खत्म करने के लिए सरकार ने चार सदस्य नियुक्त करने का फैसला लिया है, और विपक्ष इसी का विरोध कर रहा है।

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