रविवार, 8 नवंबर 2026

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दोनों राष्ट्रवादी पार्टियों के विलय की चर्चा फिर तेज, शरद पवार के फैसले पर टिकी नजर

दोनों राष्ट्रवादी पार्टियों के विलय की चर्चा फिर तेज, शरद पवार के फैसले पर टिकी नजर तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
सियासत PT24 राजनीति डेस्क

दिवाली के बीच विलय की चर्चा ने फिर जोर पकड़ा है। कहा जा रहा है कि भाजपा ने दोनों पार्टियों को साथ लाने के लिए फील्डिंग लगाई है, पर अंतिम फैसला शरद पवार का होगा।

दोनों राष्ट्रवादी पार्टियों के विलय की चर्चा एक बार फिर शुरू हो गई है। राज्य की राजनीति करवट बदलने की जोरदार चर्चा है। दोनों तरफ से विलय का कार्ड फिर फेंका गया है और ऐन दिवाली में आरोप-प्रत्यारोप और दावों-प्रतिदावों का दौर चल पड़ा है।

वरिष्ठ नेता शरद पवार की तबीयत बिगड़ने पर उन्हें पहले पुणे के रूबी और फिर ब्रीच कैंडी अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया। उसी वक्त प्रफुल पटेल ने उनसे मुलाकात की और विलय की चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया। यह सुर भी उठ रहा है कि दोनों पार्टियों को साथ लाने के लिए भाजपा ने फील्डिंग लगाई है।

पुणे के रूबी अस्पताल में इलाज के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शरद पवार को फोन किया। वे बोले कि आप सेहत का ध्यान रखिए, सुप्रिया दीदी और हम देश संभाल लेंगे। इस बयान को सूचक बताने की चर्चा राजनीति में शुरू हो गई। इससे पहले अजित पवार गुट के प्रतिनिधिमंडल ने दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी। माना जा रहा है कि यह सब एक ही राजनीतिक कड़ी का हिस्सा है। राजनीतिक विश्लेषकों का दावा है कि कांग्रेस के आक्रामक रुख पर ब्रेक लगाने के लिए भाजपा क्षेत्रीय पार्टियों को ताकत देने की चाल चल रही है।

शीतकालीन अधिवेशन के लिए संख्याबल का गणित भी बताया जा रहा है। परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे अहम विधेयकों के लिए भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए को 36 सांसदों के समर्थन की जरूरत है। अलग-अलग राज्यों से यह आंकड़ा जुटाने की कोशिश है। दावा किया जा रहा है कि संख्याबल बढ़ाने के लिए ही भाजपा रणनीतिक चाल चल रही है। ग्रीष्मकालीन अधिवेशन में इन्हीं दोनों विधेयकों को लेकर भाजपा को बड़ा झटका लगा था। पिछले 12 साल में सरकार का एक भी विधेयक नहीं गिरा था, लेकिन इस बार विपक्ष ने एकजुटता दिखाई, इसलिए लगता है कि भाजपा ने अब रणनीति बदल ली है।

चर्चा है कि दोनों राष्ट्रवादी एक हुईं तो भाजपा को बड़ा फायदा होगा और पश्चिम महाराष्ट्र की राजनीति पर दूरगामी असर पड़ेगा। एकनाथ शिंदे की शिवसेना को भी बड़ी मात दी जा सकेगी। राष्ट्रवादी मजबूत हुई तो भाजपा का एक पलड़ा भारी होगा और शिंदे सेना के दबाव की राजनीति को राष्ट्रवादी के रूप में जवाब देने की कोशिश होगी। इन सब चर्चाओं के बीच अंतिम फैसला शरद पवार का ही होगा, इसलिए राजनीति की दिशा इस पर टिकी है कि पवार कौन सी ताकत दिखाते हैं।

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