वित्त वर्ष 27-28 में ऑटो कंपनियों की कमाई पर कच्चे माल की महंगाई का दबाव, रिपोर्ट
Systematix Institutional Equities की रिपोर्ट के मुताबिक कच्चे माल की बढ़ती कीमतें और मांग में सुस्ती वाहन कंपनियों के मुनाफे पर असर डाल सकती हैं।
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भारतीय ऑटोमोबाइल सेक्टर में आने वाले वित्त वर्षों के दौरान कमाई के मामले में बड़े बदलाव की संभावना जताई गई है। Systematix Institutional Equities की रिपोर्ट के मुताबिक FY26 से FY28 के बीच वाहन कंपनियों की कमाई के मोर्चे पर फेरबदल दिख सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कच्चे माल की बढ़ती कीमतें और वाहनों की मांग में संभावित सुस्ती कंपनियों के मुनाफे पर दबाव डाल सकती हैं। इसलिए कंपनियों के लिए सिर्फ ज्यादा गाड़ियां बेचना काफी नहीं होगा, मुनाफा बचाए रखना भी उतना ही जरूरी होगा।
रिपोर्ट के हिसाब से FY27 बड़ी उथल-पुथल का साल नहीं, बल्कि हालात के सामान्य होने का दौर साबित हो सकता है। जीएसटी से जुड़े उपायों की वजह से वाहन बिक्री को जो रफ्तार मिली थी, वह धीरे-धीरे कम पड़ सकती है। उसी वक्त ग्राहकों की खरीदने की ताकत, नए मॉडलों की मांग और गाड़ियों के दाम का असर पूरी इंडस्ट्री पर पड़ सकता है। यानी कंपनी कितनी कामयाब है, यह सिर्फ बिक्री के आंकड़ों से तय नहीं होगा। यह भी देखा जाएगा कि बिक्री से कितना मुनाफा मिल रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक इस माहौल में उन कंपनियों को फायदा मिल सकता है जिनके पास प्रीमियम वाहनों की मजबूत रेंज है, जो नई गाड़ियां लॉन्च कर रही हैं, जिनकी उत्पादन व्यवस्था कारगर है और जिनका आर्थिक ताना-बाना मजबूत है। कच्चे माल का खर्च काबू में रखने और पूंजी का सही इस्तेमाल करने से कंपनियां मध्यम बिक्री बढ़त के बावजूद अपनी कमाई में सुधार कर सकती हैं।
दूसरी तरफ, स्टील, एल्युमिनियम और दूसरे औद्योगिक कच्चे माल के दाम बढ़ने पर वाहनों के प्रोडक्शन का खर्च बढ़ सकता है। इस अतिरिक्त खर्च की भरपाई के लिए कंपनियां गाड़ियों के दाम बढ़ा सकती हैं। लेकिन दाम बढ़ने से खासकर एंट्री-लेवल वाहनों की मांग पर असर पड़ने की आशंका है। बाद में कच्चे माल की कीमतें घटें, तब भी कंपनियां कुछ बढ़ी हुई कीमतें बनाए रख सकती हैं, जिससे उनके मुनाफे को सहारा मिल सकता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कच्चे माल की कीमतों का असर हर वाहन कंपनी पर एक जैसा नहीं होगा। यह इस पर निर्भर करेगा कि कंपनी कौन सा कच्चा माल इस्तेमाल करती है, सप्लायरों से उसके क्या करार हैं, उसके पास कितना स्टॉक है और वह खर्च घटाने की कितनी क्षमता रखती है। वाहनों की बिक्री, ऑपरेटिंग मार्जिन और पूंजी का कारगर इस्तेमाल भी अहम कारक होंगे।
लंबे समय के नजरिए से रिपोर्ट भारतीय ऑटो सेक्टर को लेकर सकारात्मक है। नई प्रोडक्शन सुविधाओं, इलेक्ट्रिक और दूसरे वैकल्पिक पावरट्रेन, स्थानीय उत्पादन, टेक्नोलॉजी और निर्यात में होने वाला निवेश आगे चलकर बढ़त के मौके बना सकता है। इसलिए FY27-28 में निवेशकों की नजर इस पर रहेगी कि कौन सी कंपनियां खर्च पर काबू रखकर टिकाऊ मुनाफा बढ़ा पाती हैं।