विठ्ठलवाडा के होटल में मां की भागदौड़ के बीच बेटी की पढ़ाई
गोंडपिपरी तालुका के विठ्ठलवाडा में हाईवे किनारे के छोटे से होटल में एक बच्ची मां-बाप के काम के बीच रोज़ पढ़ाई करती है।
गोंडपिपरी तालुका के विठ्ठलवाडा में हाईवे के किनारे एक छोटा सा होटल है। यहां एक परिवार की मेहनत और एक छोटी बच्ची की पढ़ाई की लगन साथ-साथ देखने को मिलती है। घर के हालात बहुत अच्छे नहीं हैं और मां-बाप को रोज़ी-रोटी के लिए दिन-रात भागदौड़ करनी पड़ती है।
परिवार का गुज़ारा चलाने के लिए पिता पान की ठेली चलाते हैं। मां और घर के दूसरे लोग होटल में तरह-तरह की चीज़ें बनाने से लेकर बेचने तक का काम संभालते हैं। सुबह से शुरू हुई यह भागदौड़ पूरे दिन चलती रहती है।
इसी घर की यह बच्ची सुबह स्कूल जाती है। पीठ पर बस्ता, आंखों में सपने और मन में पढ़ने की जिद लेकर वह निकलती है। स्कूल छूटने के बाद वह बाकी बच्चों की तरह खेलने नहीं जाती, सीधे मां-बाप के पास आ जाती है। खेलने-कूदने की उम्र में वह उनके काम में हाथ भी बंटाती है।
होटल में ग्राहकों की आवाजाही रहती है, रसोई में हलचल मचती है, बर्तनों की आवाज़ गूंजती है और मां दौड़-भाग करती रहती है। इस माहौल में भी बच्ची के चेहरे पर कोई शिकायत नहीं दिखती। न खाने की ज़िद, न खेलने की ज़िद, हालात से कोई नाराज़गी नहीं। वह चुपचाप बस्ता नीचे रखती है, कॉपी-किताबें निकालती है और ऐसे पढ़ने बैठ जाती है मानो यही उसके पढ़ने का घर हो। यह उसका रोज़ का नियम बन गया है।
मां के हाथों की त्वचा मेहनत से सख्त हो चुकी है, और बेटी के हाथ में कॉपी और पेन है। यह नज़ारा देखने वालों के दिल को छू जाता है। मां-बाप का संघर्ष आंखों के सामने देखकर बच्ची की पढ़ने की जिद दिन-ब-दिन और पक्की होती गई है। मां के माथे का पसीना देखकर बेटी को पढ़ाई की अहमियत समझ आती है, और बेटी के हाथ में पेन देखकर मां के मन में आने वाले कल के सपने खिलते हैं।
मां के मन की चुपचाप इच्छा है, "मेरी बेटी पढ़े, बड़ी बने..." और बेटी का इरादा है, "मां-बाबा ने जो मेहनत की है, उसका फल दिखाना है..." इन दोनों भावनाओं का मेल इस छोटे से होटल में हर रोज़ दिखता है।
आज मोबाइल और सोशल मीडिया के दौर में कई बच्चों का ध्यान पढ़ाई से ज़्यादा स्क्रीन की तरफ चला जाता है। लेकिन इस बच्ची के पास न महंगा पढ़ाई का कमरा है, न शांत माहौल, न कोई खास सुविधा। फिर भी उसका पेन नहीं रुकता और आंखों के सपनों की चमक कम नहीं होती।
बड़ी सुविधाएं न होने पर भी बड़े सपने देखने वाली इस बच्ची ने हालात के आगे हार नहीं मानी और पढ़ाई की राह पकड़ी है। मां-बेटी के रिश्ते की यह सच्ची कहानी समाज के लिए प्रेरणा का संदेश बन रही है। हो सकता है कल यही बच्ची किसी बड़े पद पर पहुंचे और उसकी कामयाबी की चर्चा हो। पर उस कामयाबी की हर सीढ़ी के नीचे मां की मेहनत का पसीना, पिता की मेहनत की ताकत और विठ्ठलवाडा के इस छोटे से होटल में की गई पढ़ाई के अनगिनत पलों की याद छिपी होगी।