मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

अभी सब्सक्राइब करें
प्राइम अलर्ट
सारे लाइव अपडेट
17:46 IST

विदर्भ में पितृपक्ष के दौरान होता है हाडपक्या गणपति उत्सव, 1787 से चली आ रही परंपरा

नागपुर के भोसले राजघराने से शुरू हुआ हाडपक्या गणपति उत्सव करीब 239 साल पुराना है और आम गणेशोत्सव से अलग समय पर मनाया जाता है।

विदर्भ में पितृपक्ष के दौरान होता है हाडपक्या गणपति उत्सव, 1787 से चली आ रही परंपरा
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में गणेशोत्सव की एक परंपरा ऐसी भी है, जो आम गणेश उत्सव से बिल्कुल अलग समय पर मनाई जाती है। इसे हाडपक्या गणपति उत्सव कहा जाता है। यह उत्सव सामान्य गणेशोत्सव से अलग है।

नागपुर समेत विदर्भ के कई हिस्सों में आज भी इस परंपरा को धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से आगे बढ़ाया जा रहा है। इसकी शुरुआत वर्ष 1787 में होने का उल्लेख मिलता है, यानी इस परंपरा को करीब 239 वर्ष पूरे हो रहे हैं।

हिंदू धर्म में आमतौर पर पितृपक्ष को पूर्वजों के स्मरण और श्राद्ध कर्म के लिए अहम माना जाता है। इस दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। इसके बावजूद विदर्भ में इसी समय गणपति उत्सव मनाया जाता है, और यही बात यहां के गणपति उत्सव को अलग पहचान देती है।

यह उत्सव सिर्फ विदर्भ तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में भी हाडपक्या गणपति उत्सव मनाया जाता है। नागपुर से सटे पांढुर्णा और छिंदवाड़ा जिले में बड़ी संख्या में मराठी लोग रहते हैं, इसी वजह से वहां भी यह उत्सव होता है।

नाम की बात करें तो स्थानीय परंपरा के अनुसार विदर्भ में पितृपक्ष को हाडपक भी कहा जाता है। इसी कारण पितृपक्ष में बिठाए जाने वाले गणपति को हाडपक्या गणपति कहा गया। कुछ जगहों पर इसे मस्कर्या गणपति के नाम से भी जाना जाता है।

इतिहास के अनुसार नागपुर के भोसले राजघराने के श्रीमंत खंडोजी महाराज भोसले, जिन्हें चिमणाबापू के नाम से भी जाना जाता है, उन्होंने 1787 में इस उत्सव की शुरुआत की थी। कहा जाता है कि बंगाल की स्वारी से लौटते वक्त पारंपरिक गणपति उत्सव का समय निकल चुका था। फिर राजपुरोहित और विद्वानों से बातचीत हुई और भाद्रपद कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी के दिन गणपति उत्सव मनाने का फैसला लिया गया। आगे चलकर यही परंपरा हाडपक्या गणपति उत्सव के नाम से मशहूर हुई।

हाडपक्या गणपति की मूर्ति सामान्य गणेश प्रतिमाओं से अलग रूप के लिए जानी जाती है। परंपरा के अनुसार यह मूर्ति 18 हाथों वाली होती है। कुछ शिल्प परंपराओं में इसे महालक्ष्मी के 14 हाथ और गणपति के चार हाथों के संयुक्त रूप से जोड़ा जाता है। गणपति के इस रूप को अलग-अलग शक्तियों के एक साथ आने का प्रतीक माना जाता है।

पुराने समय में यह उत्सव सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं था। इस दौरान लावणी, भारूड, पोवाड़ा, नाटक, नकला और खड़ी गंमत जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। वक्त के साथ उत्सव का रूप बदला है और अब ऑर्केस्ट्रा, सुगम संगीत, नाटक व दूसरे सामाजिक कार्यक्रम होते हैं।

नागपुर के महाल इलाके में स्थित भोसले राजवाड़े का हाडपक्या गणपति इस परंपरा का प्रमुख केंद्र माना जाता है। पितृपक्ष की चतुर्थी पर गणपति की स्थापना की जाती है और उत्सव करीब दस दिन चलता है। भाद्रपद कृष्ण द्वादशी को उत्सव का समापन कर गणपति का विसर्जन किया जाता है।

क्या हम इस विज़िट को गिन लें? PT24 गूगल एनालिटिक्स से देखता है कि कौन सी खबरें किस पर पढ़ी जाती हैं। आपके हां कहने तक यह बंद है, आप सोच रहे हैं तब तक कुछ नहीं गिना जाता, और आप You पर कभी भी अपना मन बदल सकते हैं। हम क्या लेंगे