मौत के बाद घर में 10 दिन दीया क्यों जलता है, आटे के निशान पर क्या कहा गया
मौत के बाद घर में 10 दिन दीया जलाए रखने की परंपरा, उसके पीछे की मान्यता और आटे पर बनने वाले निशान को लेकर फैली गलतफहमी।
हिंदू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक हर बात के पीछे एक सोच बताई जाती है। इंसान के जन्म से पहले ही संस्कार शुरू हो जाते हैं और मरने के बाद भी उसे आदर के साथ विदा किया जाता है। मान्यता है कि आत्मा कभी नहीं मरती, सिर्फ शरीर बदलता है। इसी वजह से किसी के गुजरने के बाद भी उसके लिए कुछ विधियां की जाती हैं। इनमें से एक है घर में 10 दिन लगातार दीया जलाकर रखना।
कई घरों में यह किया जाता है, लेकिन ऐसा क्यों किया जाता है, यह बहुत लोगों को पता नहीं होता। कहा गया है कि इसके पीछे अंधश्रद्धा नहीं, बल्कि एक बड़ा शास्त्र है।
शास्त्र में बताया गया है कि जब किसी इंसान की जान जाती है, तो आखिरी वक्त पर उसके सामने जो दीया ओवाला जाता है, उसकी लौ में उसकी आत्मा आ जाती है। यानी वह दीया गुजरे हुए इंसान का ही रूप माना जाता है। जैसे देवपूजा में हम चावल की ढेरी पर देवता को रखते हैं, वैसे ही इस दीये के लिए घर में एक जगह आटे या अनाज का गोल बनाकर उस पर दीया रखा जाता है। इस दीये को कभी बुझने नहीं दिया जाता और वह लगातार जलता रखा जाता है।
पहले दिन दीये के पास सिर्फ पानी का लोटा रखा जाता है। दूसरे दिन से रोज खाने के वक्त थोड़ा सा चावल का पिंड या दूध की कटोरी रखी जाती है। यह यूं ही नहीं रखा जाता। शरीर छूटने के बाद आत्मा एक सफर पर निकलती है और उस सफर में उसे भूख न लगे और ताकत मिले, इसलिए यह शिदोरी यानी रास्ते का खाना होता है।
कहा जाता है कि इंसान के जाने के बाद उसे फौरन दूसरा शरीर नहीं मिलता। पहले 10 दिनों में रोज किए गए पिंडदान से उसके सूक्ष्म शरीर के अवयव बनते हैं। इसी को अवयव श्राद्ध कहते हैं। 10वें दिन वह शरीर पूरा तैयार हो जाता है, फिर दीये को नदी पर ले जाकर विसर्जित किया जाता है। तब आत्मा अगले सफर पर निकल पड़ती है।
आटे पर बने निशान और योनि के रिश्ते को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी है। 10वें दिन दीया उठाने पर नीचे आटे पर कोई आकार उभर आता है। कोई कहता है कि इंसान के पांव का निशान बना तो वह फिर इंसान बनेगा, और पक्षी के पंजे का बना तो पक्षी बनेगा। लेकिन यह बिलकुल गलत है। असल में दीये का तला खुरदुरा होता है। 10 दिन एक ही जगह रखे रहने से उसका दबाव पड़ता है और आटे पर लकीरें उभर आती हैं। इसका आत्मा से कोई लेना-देना नहीं है। इस पर डरने की जरूरत नहीं है, क्योंकि योनि तय करना इतना आसान नहीं होता।
कई बार हवा से या तेल खत्म होने से दीया बुझ जाता है और घर के लोग घबरा जाते हैं कि अपशकुन हो गया। लेकिन शास्त्र में ऐसा कुछ नहीं है। दीया बुझ जाए तो उसे फौरन साफ करके दोबारा जला देना चाहिए, कोई दोष नहीं लगता। अगर मौत किसी दूसरे गांव या शहर में हुई हो, या 10 दिन दीया रखना मुमकिन न हो, तो सिर्फ एक दिन दीया जलाना भी चलता है।
शास्त्र लोगों को तकलीफ देने के लिए नहीं, बल्कि गुजरे हुए जीव को शांति मिले इसलिए है। इसलिए इस विधि को डर की नजर से न देखें। यह गुजरे हुए इंसान को रोशनी दिखाने और अगले सफर के लिए ताकत देने का एक सात्विक तरीका है।