तिसरा मंदिर विवाद: अल-अक्सा की जगह पर ही मांग क्यों उठती है, जानिए पूरी बात
जेरुसलेम के टेम्पल माउंट यानी हरम अल-शरीफ को लेकर सदियों पुराना विवाद फिर चर्चा में है, समझिए तिसरे मंदिर की मांग की जड़ क्या है
जेरुसलेम में टेम्पल माउंट, जिसे हरम अल-शरीफ भी कहा जाता है, दुनिया की सबसे संवेदनशील धार्मिक जगहों में गिना जाता है। यहूदी परंपरा के मुताबिक इसी इलाके में प्राचीन यहूदी मंदिर बने थे। लेकिन दूसरा मंदिर इसवी सन ७० में रोमनों ने तबाह कर दिया था। उसके बाद से कुछ धार्मिक यहूदी गुटों में यह ख्याल जिंदा रहा कि आगे चलकर वहां फिर से मंदिर बनाया जाए। इसी मांग को तिसरा मंदिर कहा जाता है।
पहला मंदिर यहूदी धार्मिक मान्यता के हिसाब से राजा सोलोमन के जमाने से जुड़ा बताया जाता है। वो मंदिर टूटने के बाद दूसरा मंदिर बनाया गया, जिसे इसवी सन ७० में रोमन साम्राज्य ने ढहा दिया। इसी वजह से टेम्पल माउंट को यहूदी धर्म में बेहद पवित्र जगह माना जाता है।
पर आज उसी जगह पर मुस्लिम धर्म की भी अहम पवित्र इमारतें खड़ी हैं। अल-अक्सा मस्जिद और डोम ऑफ द रॉक इसी परिसर में हैं। इसीलिए मंदिर दोबारा बनाने की बात सीधे धार्मिक और राजनीतिक संवेदनशीलता से जुड़ जाती है।
कुछ धार्मिक-राष्ट्रवादी यहूदी गुट प्राचीन मंदिर को फिर से खड़ा करना अपना धार्मिक लक्ष्य मानते हैं। उनका कहना है कि जहां प्राचीन यहूदी मंदिर था, ठीक उसी पवित्र जगह पर मंदिर का पुनर्निर्माण होना चाहिए। कुछ कट्टर कार्यकर्ताओं ने तो मौजूदा इस्लामी इमारतों को हटाकर वहां मंदिर बनाने का विचार भी रखा है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर जायोनिस्ट या हर इस्राइली इस सोच का समर्थन करता है। जायोनिज्म के भीतर भी धार्मिक, धर्मनिरपेक्ष और राजनीतिक, कई तरह के विचार मौजूद हैं। तिसरे मंदिर की मांग मुख्य रूप से कुछ चुनिंदा धार्मिक-राष्ट्रवादी गुटों से ही जुड़ी हुई है।
अल-अक्सा मस्जिद मुसलमानों के लिए बेहद पवित्र स्थान है। इसी वजह से वहां मौजूदा व्यवस्था बदलने या इस्लामी इमारतों को हटाने का कोई भी विचार बड़े धार्मिक और राजनीतिक टकराव की वजह बन सकता है।
यही कारण है कि टेम्पल माउंट पर चली आ रही स्टेटस क्वो यानी यथास्थिति को बेहद नाजुक माना जाता है। यहूदी और मुस्लिम, दोनों समुदायों के धार्मिक हक, नमाज-प्रार्थना, प्रवेश और इलाके पर नियंत्रण से जुड़ा कोई भी बदलाव तनाव बढ़ा सकता है। इसीलिए तिसरा मंदिर सिर्फ एक धार्मिक मुद्दा नहीं रह गया, बल्कि यह जेरुसलेम के भविष्य से जुड़ा एक बड़ा और उलझा हुआ टकराव बन चुका है।