ताजिक-अफगान सीमा पर रूस की मदद तेज, आज मॉस्को में अफगानिस्तान पर 8वीं बैठक
रूस ताजिकिस्तान और अफगानिस्तान की 1,300 किलोमीटर लंबी सीमा पर सुरक्षा मजबूत कर रहा है, और आज मॉस्को में अफगानिस्तान पर मॉस्को फॉर्मेट की 8वीं बैठक है।
रूस ने ताजिकिस्तान और अफगानिस्तान की 1,300 किलोमीटर लंबी संवेदनशील सीमा पर सुरक्षा इंतजाम कड़े करने शुरू कर दिए हैं। अफगान इलाके से हथियारबंद गुटों की संभावित हरकत और सीमा पार घुसपैठ को देखते हुए रूसी प्रशासन ने ताजिक सीमा बल को आधुनिक हथियार, तकनीकी उपकरण और फौजी मदद देने का फैसला किया है। रूसी विदेश मंत्रालय के CIS विभाग के डायरेक्टर अलेक्जेंडर स्टर्निक ने इस बारे में कहा कि मॉस्को ताजिक-अफगान सीमा के हालात पर बहुत बारीकी से नजर रखे हुए है और मध्य एशिया में स्थिरता बनाए रखने के लिए ताजिकिस्तान के साथ मजबूती से खड़ा है।
यह मदद सिर्फ दो देशों के बीच के करार तक सीमित नहीं है। यह सामूहिक सुरक्षा संधि संगठन (CSTO) के पांच साल के कार्यक्रम का अहम हिस्सा है। यह कार्यक्रम 2024 में मंजूर हुआ था। इसके तहत ताजिक सीमा सुरक्षा बल की ताकत बढ़ाने, निगरानी के आधुनिक सिस्टम लगाने और रसद सप्लाई सुधारने पर जोर दिया जा रहा है। अगस्त में सीमा पर गोलीबारी और घुसपैठ की घटनाएं हुई थीं, जिसके बाद इस मदद की रफ्तार बढ़ाई गई। CSTO की योजना के मुताबिक फौजी साजो-सामान की पहली बड़ी खेप 2026 की सर्दियों में सीमा पर पहुंचने की उम्मीद है। इस पूरी सप्लाई में रूस की भूमिका केंद्र में है।
ताजिकिस्तान में रूस का 201वां मिलिट्री बेस मध्य एशिया में मॉस्को की फौजी मौजूदगी की रीढ़ माना जाता है। इस बेस के जरिए ताजिक-अफगान सीमा को महफूज रखना रूस की इलाकाई सुरक्षा नीति की सबसे बड़ी प्राथमिकता रही है। अफगानिस्तान की अस्थिरता या आतंकी संगठनों का असर मध्य एशियाई गणराज्यों तक न फैले, इसके लिए रूसी फौज ने ताजिक सीमा सुरक्षा एजेंसियों के साथ सीधा तालमेल बनाया है।
एक तरफ सीमा पर तैयारी बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ कूटनीतिक बातचीत भी तेज है। आज 5 अक्टूबर को मॉस्को में अफगानिस्तान पर मॉस्को फॉर्मेट consultations की 8वीं बैठक हो रही है। इसमें अफगानिस्तान, रूस, चीन, भारत, ईरान, पाकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान हिस्सा ले रहे हैं, जबकि बेलारूस और मिस्र मेहमान के तौर पर शामिल हैं। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव बैठक की शुरुआत करेंगे। अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी, जो रूस की 2025 की मान्यता के बाद अब पूर्ण सदस्य के तौर पर आ रहे हैं, लावरोव से अलग से भी मिलेंगे और आपसी सहयोग पर बात करेंगे।
एजेंडे में इलाके की सुरक्षा, अफगानिस्तान के साथ राजनीतिक और आर्थिक जुड़ाव, आतंकवाद के खिलाफ क्षेत्रीय तालमेल और नशीले पदार्थों की तस्करी रोकने की साझा कोशिशें सबसे ऊपर रहने की उम्मीद है। बैठक के आखिर में एक साझा बयान आने की उम्मीद है।
मॉस्को फॉर्मेट की शुरुआत 2017 में हुई थी। अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता संभालने के बाद इसने बदले हालात के हिसाब से खुद को ढालने की कोशिश की। अक्टूबर 2021 के बयान में कहा गया कि नए अफगान शासकों के साथ जुड़ाव "facts on the ground" को ध्यान में रखकर होना चाहिए। इसके बाद के दौर मॉस्को (नवंबर 2022), कजान (सितंबर 2023) और फिर मॉस्को (अक्टूबर 2024) में हुए। अक्टूबर 2025 की सातवीं बैठक में रूस ने इस्लामिक अमीरात को औपचारिक मान्यता दी थी और काबुल के विदेश मंत्री पूर्ण भागीदार के तौर पर शामिल हुए थे।
इस बार मुश्किल सबसे ज्यादा अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच है। इस्लामाबाद का दावा है कि पक्तिया, कुनार और हेलमंद में हाल के हमलों में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के आतंकी मारे गए। तालिबान की अमीरात सरकार इस दावे को खारिज करती है और कहती है कि औरतों और बच्चों समेत दर्जनों आम लोग मारे गए। संयुक्त राष्ट्र मिशन UNAMA ने ताजा हमले में कम से कम दस आम लोगों की मौत और कई के घायल होने का आकलन किया है। उसके मुताबिक इस साल हवाई और जमीनी हमलों में अफगान की तरफ 1,100 से ज्यादा आम लोग हताहत हो चुके हैं।
अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि सीमा पर रूस की बढ़ी हुई फौजी, तकनीकी और कूटनीतिक मौजूदगी मध्य एशिया में उसकी रणनीतिक पकड़ बनाए रखने का ही हिस्सा है।