तेल बाजार में उतार-चढ़ाव कई साल तक रह सकता है, अधिकारियों ने दी चेतावनी
कुछ अधिकारियों के मुताबिक कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और सप्लाई को लेकर अनिश्चितता कई साल बनी रह सकती है।
दुनिया भर के एनर्जी बाजार पर युद्ध जैसे हालात, सप्लाई चेन की रुकावटों और भू-राजनीतिक तनाव का दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में तेल बाजार की अस्थिरता जल्दी खत्म होने की संभावना कम दिख रही है, ऐसे संकेत मिल रहे हैं।
कुछ अधिकारियों के मुताबिक कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और सप्लाई को लेकर अनिश्चितता कई साल तक बनी रह सकती है। मध्यपूर्व के संघर्ष और अहम समुद्री रास्तों पर बढ़ते तनाव की वजह से दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के सामने ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती खड़ी हो गई है।
मध्यपूर्व के संघर्ष का सीधा असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ रहा है। तेल उत्पादक देशों में अस्थिरता बढ़ती है तो उत्पादन, ढुलाई और निर्यात पर असर पड़ने की संभावना रहती है। खास तौर पर लाल समुद्र, एडन की खाड़ी और दूसरे अहम समुद्री रास्तों की सुरक्षा का सवाल खड़ा हो जाए, तो जहाजों को दूसरे रास्तों से जाना पड़ सकता है। इससे ढुलाई का खर्च बढ़ने के साथ-साथ तेल की कीमतों पर भी दबाव आ सकता है।
ग्लोबल तेल बाजार में सप्लाई और डिमांड का संतुलन बहुत अहम होता है। बड़े तेल उत्पादक देशों का उत्पादन घटे या निर्यात में रुकावट आए, तो बाजार में सप्लाई की कमी हो सकती है। दूसरी तरफ वैश्विक अर्थव्यवस्था की बढ़ोतरी, औद्योगिक उत्पादन और परिवहन क्षेत्र में ईंधन की मांग की वजह से तेल की डिमांड बदलती रहती है। इन दोनों बातों के चलते कच्चे तेल की कीमतों में बड़े पैमाने पर उतार-चढ़ाव की संभावना है।
तेल की कीमतों में लंबे वक्त तक अस्थिरता का असर तेल आयात करने वाले देशों पर पड़ सकता है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए कच्चे तेल के दाम बढ़ें तो आयात का खर्च, ढुलाई का खर्च और महंगाई पर दबाव आ सकता है।
इसलिए सरकार और एनर्जी कंपनियों के सामने सप्लाई के वैकल्पिक स्रोत, ऊर्जा भंडार और दूसरे ईंधन के विकल्प मजबूत करने की चुनौती है। तेल बाजार की अनिश्चितता कई साल बनी रही, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी उसका असर झेलना पड़ सकता है।