सुविधा बनी ऑनलाइन कारोबार की असली ताकत, ग्राहक अब कम मेहनत को देते हैं तरजीह
डिजिटल इंडिया में अब कंपनियां सिर्फ ज्यादा प्रोडक्ट देकर नहीं, बल्कि ग्राहक की मेहनत कम करके बाजार जीत रही हैं।
पहले सुविधा को एक एक्स्ट्रा फायदा माना जाता था, कोई ऐसी चीज जो मिल जाए तो अच्छा। लेकिन आज हालात बदल गए हैं। अब यही सुविधा तय करती है कि ग्राहक किस दुकान या ऐप को चुनेगा और किसे छोड़ देगा।
पूरे भारत में डिजिटल सर्विसेज ने रोजमर्रा के काम करने का तरीका ही बदल दिया है। खाना मंगाना हो तो अब रेस्टोरेंट में फोन करने की जरूरत नहीं, टिकट बुक करनी हो तो मोबाइल से हो जाती है, बिल भरने में सेकंडों लगते हैं और अलग अलग दुकानों में घूमे बिना भी कई सेलर्स के प्रोडक्ट देखे जा सकते हैं। प्रोडक्ट अच्छा होना अब भी मायने रखता है, लेकिन उसे ढूंढने और खरीदने में कितनी मेहनत लगती है, यह उतना ही जरूरी हो गया है।
बिजनेस के लिए इसका मतलब है एक नए तरह का मुकाबला। ग्राहक को अपनी तरफ खींचने के लिए अब सिर्फ ज्यादा ऑफर देना काफी नहीं, कई बार बस एक स्टेप कम कर देना ही काम बना देता है।
डिजिटल कॉमर्स ने ग्राहकों के सामने इतने सारे ऑप्शन ला दिए हैं कि चुनना ही मुश्किल हो गया है। पहले जो शख्स कुछ लोकल दुकानों में तुलना करके सामान खरीद लेता था, अब उसे एक ही सर्च में दर्जनों सेलर, सैकड़ों प्रोडक्ट और अलग अलग प्राइसिंग दिखती है। यही पैटर्न ट्रैवल, इंश्योरेंस, प्रॉपर्टी और बाकी डिजिटल मार्केट्स में भी देखने को मिलता है। एक्सेस तो आसान हो गया, लेकिन डिसीजन लेना पहले से ज्यादा उलझा हुआ हो गया है। यहीं से कंपैरिजन और एग्रीगेशन सर्विसेज को मौका मिला, जो बिखरे हुए ऑप्शन को इकट्ठा करके ग्राहक के लिए फर्क समझना आसान बना देती हैं।
कैसिनो गेमिंग सेक्टर इस बात का अच्छा उदाहरण है कि सुविधा किसी ऐप या साइट यूज करने से बहुत पहले ही शुरू हो सकती है। भारत जैसे बाजार में पहली दिक्कत यही होती है कि कौन से ऑप्शन मौजूद हैं और वे एक दूसरे से कैसे अलग हैं। इसी वजह से कुछ खास वेबसाइट्स ऐसा रिसर्च पहले ही कर देती हैं ताकि यूजर तक पहुंचने से पहले जानकारी तैयार मिले। यहां जो सुविधा दी जा रही है वह कोई तेज गेम या आसान ट्रांजैक्शन नहीं, बल्कि जानकारी जुटाने में लगने वाला समय और मेहनत बचाना है। यही कमर्शियल सोच गेमिंग से बाहर भी लागू होती है, कोई कंपनी नया प्रोडक्ट बनाए बिना भी सिर्फ मौजूदा प्रोडक्ट्स के बीच रास्ता दिखाकर वैल्यू पैदा कर सकती है।
स्पीड इस पूरी सुविधा वाली इकॉनमी का सबसे साफ उदाहरण है। भारत के क्विक कॉमर्स सेक्टर ने दिखाया है कि यह कितना असरदार हो सकता है। कंपनियों ने अब ग्राहक से घंटों या दिनों पहले प्लान करने को नहीं कहा, बल्कि खरीदने का फैसला लेने और सामान मिलने के बीच का गैप ही बहुत छोटा कर दिया। लेकिन सिर्फ स्पीड से सुविधा पूरी नहीं होती। कोई होटल वेबसाइट तुरंत लोड हो जाए, फिर भी अगर सही कमरा ढूंढने के लिए दस उलझी हुई पेज खंगालनी पड़े तो वह फ्रस्ट्रेटिंग ही रहेगी। कोई शॉपिंग ऐप जल्दी डिलीवर कर दे, फिर भी अगर मिलते जुलते प्रोडक्ट कंपेयर करना मुश्किल हो तो फायदा नहीं। इसलिए कंपनियां अब सिर्फ ग्राहक के पैसे के लिए नहीं, उसके टाइम और अटेंशन के लिए भी मुकाबला कर रही हैं।
अच्छा डिजिटल डिजाइन ट्रांजैक्शन शुरू होने से पहले ही फालतू मेहनत कम कर देता है। सर्च फिल्टर सैकड़ों प्रोडक्ट को मैनेज करने लायक चुनिंदा लिस्ट में बदल देते हैं। सेव्ड एड्रेस बार बार टाइप करने की झंझट खत्म कर देते हैं। साफ कैटेगरी से ब्राउजिंग का टाइम कम होता है। बुकिंग प्लेटफॉर्म एक ही स्क्रीन पर प्राइस, डेट और अवेलेबिलिटी दिखा देते हैं। ये देखने में छोटी छोटी डिजाइन डिटेल्स लगती हैं, लेकिन मिलकर यह तय करती हैं कि कोई सर्विस यूज करने में कितनी आसान या मुश्किल लगती है। भारत का बढ़ता डिजिटल कॉमर्स ढांचा भी यह एक्सपेरिमेंट कर रहा है कि खरीदार और बेचने वाले एक दूसरे तक कैसे पहुंचें। सरकार का ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC) एक ओपन नेटवर्क सिस्टम को बढ़ावा देता है, जिसमें लोग किसी एक बंद प्लेटफॉर्म पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अलग अलग ऐप्स के बीच इंटरैक्ट कर सकें।
दिलचस्प बात यह है कि ग्राहक के लिए किसी सर्विस को जितना आसान बनाया जाता है, कंपनी के लिए उसे चलाना उतना ही ज्यादा उलझा हो जाता है। तेज डिलीवरी के लिए इन्वेंट्री का अंदाजा लगाना, वेयरहाउस, लॉजिस्टिक्स सिस्टम और डिलीवरी वर्कर्स के साथ तालमेल चाहिए। इंस्टेंट ट्रैवल बुकिंग लगातार अपडेट होती अवेलेबिलिटी पर टिकी होती है। कंपैरिजन सर्विसेज को सही रहने के लिए कई सोर्स से जानकारी चाहिए होती है। ग्राहक को बस एक बटन दिखता है, लेकिन उस बटन के पीछे एक बहुत बड़ा ऑपरेशनल सिस्टम काम कर रहा होता है। यानी सफल सुविधा वाले बिजनेस उलझन खत्म नहीं करते, बस उसे ग्राहक की नजरों से दूर हटा देते हैं।
यह इसलिए मायने रखता है क्योंकि छोटी छोटी परेशानियां बड़े स्तर पर दोहराई जाएं तो असर बड़ा हो जाता है। मान लीजिए कोई ऑनलाइन कंपनी बेवजह लंबा रजिस्ट्रेशन फॉर्म भरवाती है। ज्यादातर लोग शायद उसे झेल लें, लेकिन कुछ बीच में ही छोड़ देंगे। अगर रोज हजारों लोग उस पेज तक पहुंचते हैं, तो थोड़ा सा भी ड्रॉप आउट रेट बड़े नुकसान में बदल सकता है। यही बात उलझी नेविगेशन, अस्पष्ट प्राइसिंग, कमजोर सर्च टूल और पेचीदा कैंसिलेशन प्रोसेस पर भी लागू होती है। फ्रिक्शन कम करना सिर्फ वेबसाइट को अच्छा दिखाने के लिए नहीं है, यह तय करता है कि कोई ग्राहक ट्रांजैक्शन पूरी करेगा या बीच में ही छोड़ देगा।
फिर भी इसकी एक सीमा है। कंपनियां तेज डिलीवरी, आसान रिटर्न और ज्यादा पर्सनलाइज्ड सर्विस का वादा तो कर सकती हैं, लेकिन हर सुधार की एक कीमत होती है। ग्राहक के लिए फ्रिक्शन हटाने के लिए एक्स्ट्रा टेक्नोलॉजी, स्टाफ या इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए हो सकता है। असली चुनौती यह पहचानना है कि कौन सी दिक्कतें सच में मायने रखती हैं। जो कंपनी सही तीन स्टेप हटा दे, वह उस कंपनी से ज्यादा वैल्यू बना सकती है जो दस ऐसे फीचर जोड़ दे जिनकी किसी ने मांग ही नहीं की।
इंटरनेट ने एक समस्या तो सुलझा दी, ढेर सारे प्रोडक्ट और सर्विसेज को हर किसी तक पहुंचा दिया। लेकिन इसी के साथ एक नई समस्या भी खड़ी हो गई, अब लोगों के पास इतने ऑप्शन हैं कि सबकी अलग अलग पड़ताल करना मुमकिन ही नहीं। इसीलिए सुविधा अब सिर्फ एक फीचर नहीं रह गई। कंपनियां तेज सर्विस देकर, फैसले आसान बनाकर, उलझे हुए बाजार को व्यवस्थित करके या किसी प्रोसेस को समझने में आसान बनाकर वैल्यू क्रिएट कर सकती हैं। ऑप्शन से भरी इस डिजिटल इकॉनमी में जो कंपनी ग्राहक से सबसे कम मेहनत मांगती है, शायद उसी के पास सबसे बड़ी बढ़त है।