मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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17:59 IST

सुप्रीम कोर्ट की टास्क फोर्स के सर्वे में 9 फीसदी छात्रों ने आत्महत्या के ख्याल की बात कही

सुप्रीम कोर्ट की राष्ट्रीय टास्क फोर्स के सर्वे में 15 फीसदी छात्रों ने गहरी मानसिक परेशानी की बात कही।

सुप्रीम कोर्ट की टास्क फोर्स के सर्वे में 9 फीसदी छात्रों ने आत्महत्या के ख्याल की बात कही
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

देशभर के कॉलेज और यूनिवर्सिटी के छात्रों के बीच हुए एक बड़े सर्वे ने पढ़ाई, करियर और बेहतर भविष्य की तस्वीर का दूसरा पहलू सामने रखा है। यह सर्वे सुप्रीम कोर्ट की बनाई राष्ट्रीय टास्क फोर्स (नेशनल टास्क फोर्स) ने किया है।

सर्वे के मुताबिक करीब 9 फीसदी छात्रों ने बताया कि पिछले एक साल में उन्हें बार-बार या कई बार आत्महत्या के ख्याल आए। वहीं करीब 15 फीसदी छात्रों ने कहा कि पिछले छह महीनों में कई हफ्तों तक उन्होंने गहरी मानसिक परेशानी, तनाव, उदासी या चिंता झेली। लगभग हर 10 में से एक छात्र ने गंभीर मानसिक तकलीफ की बात कही।

इस सर्वे में 24.3 लाख से ज्यादा छात्रों के जवाब शामिल थे। फिर भी टास्क फोर्स ने साफ किया है कि मौजूदा सैंपल पूरे छात्र समुदाय की नुमाइंदगी नहीं करता। इसलिए ये आंकड़े शुरुआती और अस्थायी नतीजे माने जाने चाहिए। टास्क फोर्स के मुताबिक सर्वे के कई हिस्सों का विश्लेषण अभी चल रहा है।

ये आंकड़े ऐसे वक्त आए हैं जब देश में उच्च शिक्षा संस्थानों के छात्रों की मानसिक सेहत और आत्महत्या पर गंभीर चर्चा हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने इस समस्या की जांच करने और रोकथाम के उपाय सुझाने के लिए यह राष्ट्रीय टास्क फोर्स बनाई है।

कैंपस के अनुभव भी सर्वे में सामने आए। करीब 34 फीसदी छात्रों ने कहा कि उन्हें कैंपस में कमोबेश बाहरी होने जैसा लगा। सर्वे में शामिल छात्रों में करीब 67 फीसदी अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) समुदायों के थे। टास्क फोर्स इससे पहले उच्च शिक्षा में सामाजिक भेदभाव और अकेलेपन जैसे मुद्दों का अध्ययन कर चुकी है, इसलिए कैंपस में अपनापन और बराबरी का बर्ताव भी इस चर्चा का अहम हिस्सा है।

छात्रों पर दबाव सिर्फ इम्तिहान या नंबरों तक सीमित नहीं है। सर्वे में पढ़ाई का दबाव, नौकरी की अनिश्चितता और करियर चुनने की चिंता भी उभरी। अधिकारियों के मुताबिक पढ़ाई के विकल्पों को लेकर फिक्र और रोजगार से जुड़ी लगातार दिक्कतें आम थीं।

सर्वे के अनुसार करीब 32 फीसदी छात्रों ने कहा कि उनके संस्थान में काउंसलिंग उपलब्ध नहीं थी। दूसरी तरफ 56 फीसदी छात्रों ने कहा कि उन्हें भरोसा था कि उनका प्रशासन गंभीर मामलों को निष्पक्षता से संभालेगा।

अब तक दिल्ली-एनसीआर, तमिलनाडु, कर्नाटक, असम और पश्चिम बंगाल के संस्थानों समेत 19 संस्थानों में 30 बैठकें हो चुकी हैं। छात्रों ने पढ़ाई, सामाजिक जिंदगी, मानसिक सेहत और प्रशासन से जुड़ी कई दिक्कतें बताईं। इनमें सख्त उपस्थिति, ज्यादा एकेडमिक और क्लिनिकल काम का बोझ, ऑन-कॉल के लंबे घंटे, प्लेसमेंट में मुश्किलें और प्राध्यापकों की कमी शामिल हैं। छात्रों ने प्रैक्टिकल ट्रेनिंग की कमी और पीएचडी गाइड के लापरवाह या जरूरत से ज्यादा कंट्रोल करने वाले रवैये की भी शिकायत की।

इन संकेतों के आधार पर बेहतर सपोर्ट सिस्टम खड़ा करना अब टास्क फोर्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। इसमें संस्थानों में एक जैसी और बेहतर मानसिक सेहत सहायता, शिक्षकों की ट्रेनिंग, मानसिक सेहत की समस्याओं को लेकर झिझक घटाना, संकट में तुरंत मदद की व्यवस्था और नियमित निगरानी जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं। राष्ट्रीय टास्क फोर्स को 31 अक्टूबर 2026 तक अपनी अंतिम रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में देनी है।

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