स्कूलों के 50 मीटर के दायरे में जंक फूड पर बैन की तैयारी में FSSAI
बच्चों को चिप्स, कोल्ड ड्रिंक्स, समोसे और बर्गर से इतना लगाव है कि स्कूल की घंटी बजते ही कैंटीन और बाहर के ठेलों पर भीड़ लग जाती है। लेकिन अब सरकार की तैयारी है कि स्कूलों के आसपास ये चटपटी और अनहेल्दी चीजें मिलना ही बंद हो जाएं। बच्चों को मोटापे और जंक फूड की लत से बचाने के लिए भारत सरकार बड़ा कदम उठाने जा रही है, और इसकी वजह देश में लगातार बढ़ते बाल मोटापे के आंकड़े हैं।
प्लान यह है कि स्कूलों के 50 मीटर के दायरे में हाई फैट, शुगर और सॉल्ट यानी HFSS श्रेणी में आने वाले जंक फूड की बिक्री पर रोक लगा दी जाए। इस नए प्रस्ताव का दायरा देश की करीब 15 लाख स्कूलों तक जाएगा। इस पर लोकल दुकानदारों के साथ-साथ बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां भी चिंता जता रही हैं, लेकिन सरकार का मकसद साफ है, आने वाली पीढ़ी को हेल्दी बनाना।
देश में बच्चों के बीच जंक फूड का क्रेज तेजी से बढ़ा है। सस्ती कीमत और आकर्षक विज्ञापनों की वजह से पेप्सिको, कोका-कोला, मोंडेलिज और नेस्ले जैसे ब्रांड्स के प्रोडक्ट बच्चों की पहली पसंद बन गए हैं। घर के पौष्टिक खाने की बजाय बहुत से बच्चे पैक्ड चिप्स या चॉकलेट को तरजीह देते हैं। इसी आदत को बदलने के लिए फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया यानी FSSAI ने नया खाका तैयार किया है।
प्रस्ताव के मुताबिक स्कूलों के 50 मीटर के दायरे में आने वाली दुकानों और ठेलों पर चिप्स, कोल्ड ड्रिंक्स, चॉकलेट और पिज्जा-बर्गर जैसी चीजों की बिक्री रोकी जा सकती है। FSSAI के चीफ एग्जीक्यूटिव रजित पुन्हानी का कहना है कि इसका मकसद बच्चों में हेल्दी खाने की आदत डालना है। दुकानदार नॉन-HFSS यानी हेल्दी चीजें बेच सकेंगे, और इससे कंपनियों पर भी अपने प्रोडक्ट्स की रेसिपी सुधारने का दबाव बनेगा।
जंक फूड की यह बढ़ती लत सिर्फ भारत की नहीं, पूरी दुनिया की परेशानी बन गई है। वर्ल्ड ओबेसिटी फेडरेशन के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। देश में 5 से 19 साल की उम्र के जो बच्चे 2015 में ओवरवेट या बाल मोटापे के शिकार थे, उनकी संख्या करीब 2.8 करोड़ थी। यह आंकड़ा बढ़कर 2025 में 4.1 करोड़ तक पहुंच गया है, और अनुमान है कि 2040 तक यह बढ़कर 5.6 करोड़ तक पहुंच जाएगा।
बदलती लाइफस्टाइल और सस्ता जंक फूड मिलना, इस समस्या को और गंभीर बना रहा है। यही वजह है कि महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने इस मामले में सख्ती दिखाते हुए स्कूलों के पास ऐसा सामान बेचने वाली दुकानों पर कार्रवाई शुरू कर दी है। इंटरनेशनल लेवल पर चिली जैसे देशों का उदाहरण भी सामने है, जहां सख्त नियम लागू होने के बाद बच्चों में वजन बढ़ने की समस्या में कमी देखी गई है।