सांस फूलना फिटनेस की फेफड़ों की बीमारी, पहचानिए फर्क
पुणे के डॉक्टर ने बताया कि रोजमर्रा के काम में दम लगने के पीछे कमजोर फिटनेस है या फेफड़ों की तकलीफ, इसे कैसे पहचानें।
रोजमर्रा के काम करते वक्त या कोई शारीरिक हरकत करते वक्त दम लगने की शिकायत लेकर जब मरीज डॉक्टर के पास पहुंचते हैं, तो उनके मन में अक्सर एक ही सवाल होता है, डॉक्टर, ये फिटनेस कम होने की वजह से हो रहा है या फेफड़ों में कोई दिक्कत है। यह उलझन होना स्वाभाविक है, क्योंकि फिटनेस कम होने के साथ-साथ अस्थमा, सीओपीडी या ब्रॉन्कायटिस जैसी फेफड़ों की बीमारियों में भी दम लगता है। लेकिन शरीर दोनों ही हालात में अलग-अलग तरह के संकेत देता है। इस बारे में पुणे के रुबी हॉल क्लिनिक में कन्सल्टेंट पल्मोनोलॉजिस्ट और चेस्ट फिजिशियन डॉ. महावीर मोदी ने विस्तार से जानकारी दी है।
डॉ. मोदी के मुताबिक, सांस पहले जैसी होने में लगने वाला वक्त सबसे बड़ा फर्क है। अगर फिटनेस कम है तो हरकत रोककर आराम करने के बाद करीब 2 से 5 मिनट में सांस सामान्य हो जाती है। लेकिन फेफड़ों की बीमारी हो तो आराम करने के बाद भी दम लगने का अहसास बना रह सकता है, और सांस सामान्य होने में 10 से 15 मिनट या इससे ज्यादा वक्त लग सकता है।
कसरत के बाद शरीर की प्रतिक्रिया भी अलग होती है। फिटनेस कम होने पर रोज चलना शुरू करने के 2 से 3 हफ्तों में ऊर्जा और शारीरिक क्षमता सुधरने लगती है, हां पहले से ज्यादा देर चलने पर दम जरूर लगेगा। वहीं फेफड़ों की बीमारी में कसरत से तकलीफ कम होने की बजाय बनी रह सकती है, और ज्यादा जोर लगाने पर खांसी, छाती में जकड़न या सांस लेने में और दिक्कत हो सकती है। दूसरे लक्षणों पर भी ध्यान देना जरूरी है। डॉ. मोदी बताते हैं कि फिटनेस कम होने पर दम लगना, पैर थकना और सामान्य थकान महसूस हो सकती है, मगर सांस लेते वक्त घरघराहट या लगातार खांसी सहसा नहीं होती। फेफड़ों की बीमारी में सांस लेते वक्त घरघराहट, लगातार सूखी या बलगम वाली खांसी, छाती में जकड़न या कफ जैसे लक्षण दिख सकते हैं।
रोजमर्रा के काम में भी फर्क दिखता है। फिटनेस कम होने पर तीन मंजिल सीढ़ियां चढ़ने या बस पकड़ने के लिए दौड़ने जैसे मेहनत वाले काम में दम लगता है, बैठे या लेटे रहने पर खास फर्क नहीं दिखता। लेकिन फेफड़ों की बीमारी में जूते का फीता बांधने, बिस्तर लगाने या बात करने जैसे बेहद मामूली काम में भी दम लग सकता है, और पीठ के बल सीधा लेटने पर सांस लेने में और तकलीफ हो सकती है।
डॉ. मोदी ने कुछ खतरे के संकेत भी बताए हैं, जिन्हें दम लगने के साथ नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए। इनमें रात में अचानक नींद खुलना और सांस लेने में तकलीफ होना, पैर, टखने या पैरों के निचले हिस्से में सूजन आना, होंठ या नाखूनों का रंग नीला पड़ना, छाती में दबाव या भारीपन महसूस होना, और सांस के लिए बीच-बीच में रुकना पड़ने से पूरा वाक्य न बोल पाना शामिल है।
डॉ. मोदी का कहना है कि अगर किसी को लगे कि दम लगने की वजह शारीरिक सुस्ती नहीं बल्कि फेफड़ों से जुड़ी कोई वजह है, तो स्पायरोमेट्री यानी पल्मनरी फंक्शन टेस्ट नाम की सामान्य जांच काम की साबित हो सकती है। इस जांच में देखा जाता है कि फेफड़ों में कितनी हवा भर सकती है और वह कितनी तेजी से बाहर निकाली जा सकती है, जिससे दम लगने की असली वजह पता चलने में मदद मिलती है।