समोसा-जलेबी से बिरयानी तक, कई मशहूर भारतीय व्यंजनों की जड़ें विदेश में
समोसा, जलेबी, बिरयानी, नान और गुलाबजामुन जैसे व्यंजन आज पूरी तरह भारतीय लगते हैं, पर इनका इतिहास बताता है कि इनकी शुरुआत कहीं और हुई थी।
खाने का मामला भारत में सिर्फ पेट भरने तक सीमित नहीं है, हर डिश के पीछे एक किस्सा जुड़ा होता है। समोसा सुनते ही चाय की टपरी याद आ जाती है, जलेबी का नाम आते ही गरम चाशनी की खुशबू महसूस होने लगती है, और बिरयानी का जिक्र होते ही मसालों की महक दिमाग में घूम जाती है। ये चीजें हमारी जिंदगी में इतनी घुल-मिल गई हैं कि यकीन करना मुश्किल है कि इनकी शुरुआत भारत के बाहर हुई थी।
मगर खाने-पीने के इतिहास में झांकें तो पता चलता है कि कुछ मशहूर व्यंजन असल में बाहर से भारत आए और धीरे-धीरे यहां की संस्कृति का हिस्सा बन गए।
आज समोसे में आलू, मटर, मसाले और ऊपर से कुरकुरा आवरण होना तय माना जाता है। लेकिन पुराने जमाने के समोसे में आलू का कोई सवाल ही नहीं था, क्योंकि आलू खुद भारत में बाद में आया। समोसे का ताल्लुक मध्य एशिया और पश्चिम एशिया के पुराने पकवानों से जोड़ा जाता है। व्यापारियों और यात्रियों के जरिए यह भारतीय उपमहाद्वीप तक पहुंचा। इसके बाद भारतीय मसाले और आलू मिलाए गए, और तब जाकर आज वाला आलू समोसा तैयार हुआ।
गरम जलेबी और उस पर पड़ी चाशनी देखते ही मुंह में पानी आ जाता है, लेकिन जलेबी की जड़ें भी भारत के बाहर मानी जाती हैं। इसका नाता पश्चिम एशिया की 'जलेबिया' जैसी मिठाइयों से जोड़ा जाता है। भारत आने के बाद इसके स्वाद और बनाने के तरीके में बदलाव हुआ, और यह हमारे तीज-त्योहारों की खास मिठाई बन गई।
बिरयानी को लेकर तो कई कहानियां चलती हैं और इसकी असली शुरुआत पर कोई एक राय नहीं है। हालांकि माना जाता है कि इस पर पर्शियन और मध्य एशियाई खान-पान परंपरा का असर रहा है। भारत आने के बाद हैदराबादी, लखनवी, कोलकाता जैसे कई किस्मों ने इसका पूरा रूप ही बदल दिया।
नान आजकल उत्तर भारत के खाने में आम बात है, लेकिन इसका भी संबंध पर्शियन और मध्य एशियाई खान-पान परंपरा से जोड़ा जाता है। भारत में तंदूर और यहां के तरीकों की वजह से इसे अलग ही पहचान मिली।
गुलाबजामुन की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। आज शादी-ब्याह हो या खाने के बाद की मिठाई, गुलाबजामुन की मांग हमेशा बनी रहती है। इसके नाम और पुरानी रेसिपी में पर्शियन असर दिखता है, लेकिन भारत में खोया इस्तेमाल करके बनाई गई किस्म ने इसे बिल्कुल नई पहचान दे दी।
यानी इन व्यंजनों की शुरुआत चाहे कहीं भी हुई हो, भारत आने के बाद इन्हें जो स्वाद और पहचान मिली वह इतनी खास है कि आज कोई कहे कि ये विदेशी हैं तो किसी को भी यकीन नहीं होगा।