रूफटॉप सोलर पर MERC का नया ड्राफ्ट, बैंकिंग और चार्ज के नियमों में बदलाव, 12 अक्टूबर तक सुझाव मांगे
महाराष्ट्र विद्युत विनियामक आयोग ने रूफटॉप सोलर सिस्टम को लेकर नया ड्राफ्ट जारी किया है, जिसमें कुछ राहत के साथ बैंकिंग और चार्ज को लेकर नई शर्तें भी जोड़ी गई हैं।
महाराष्ट्र विद्युत विनियामक आयोग यानी MERC ने 'ग्रिड इंटरएक्टिव रूफटॉप रिन्यूएबल एनर्जी सिस्टम्स रेगुलेशन 2026' का नया ड्राफ्ट सामने रखा है। इसका सीधा असर राज्य के आम घरों, हाउसिंग सोसाइटी, दुकान-दफ्तर और फैक्ट्रियों पर पड़ने वाला है, यानी हर उस उपभोक्ता पर जो अपनी छत पर सोलर पैनल लगाकर बिजली बनाता है। उपभोक्ता और उपभोक्ता संगठन इस ड्राफ्ट पर अपनी आपत्ति या सुझाव 12 अक्टूबर तक दर्ज करा सकते हैं।
ड्राफ्ट में कुछ बातें राहत देने वाली हैं। नेट मीटरिंग पर जो पुरानी 5 मेगावाट की सीमा थी, उसे हटाने का प्रस्ताव है, जिससे बड़ी फैक्ट्रियों और कंपनियों को अपनी मंजूरशुदा क्षमता के हिसाब से बड़े सोलर प्लांट लगाने की छूट मिल जाएगी। जो लोग खुद की खपत के लिए सोलर इस्तेमाल करते हैं, उनके लिए बीटीएम सिस्टम में भी ज्यादा लचीलापन दिया गया है। वर्चुअल नेट मीटरिंग का दायरा भी बढ़ाकर उसमें लोकल बॉडी और वाटर बोर्ड जैसे सरकारी संस्थानों को भी शामिल किया गया है।
लेकिन सोलर एक्सपर्ट सुधीर बुधिया का कहना है कि मकसद नए नियमों का विरोध करना नहीं, बल्कि ऐसा बैलेंस बनाना है जिससे ग्रिड भी सुरक्षित रहे और लोगों का लगाया हुआ पैसा भी सुरक्षित रहे। उनके मुताबिक आयोग को ऐसी पॉलिसी बनानी चाहिए जो तकनीकी तौर पर ग्रिड के लिए ठीक हो, उपभोक्ताओं की जेब पर भारी न पड़े, और महाराष्ट्र के रिन्यूएबल एनर्जी टारगेट भी पूरे करे।
प्रस्तावित नियमों के मुताबिक 3 किलोवाट से ऊपर के सिस्टम में तय बैंकिंग पीरियड खत्म होने पर बची हुई सरप्लस बिजली अपने आप 'लैप्स' हो जाएगी, यानी वो जब्त मानी जाएगी। इस पर सवाल उठाया गया है कि उपभोक्ता के पैसे से बनी बिजली को बिना किसी मुआवजे के इस तरह छीन लेना ठीक नहीं है। इसके साथ ही आयोग ने फिक्स्ड बैंकिंग चार्ज यानी FBC और वेरिएबल बैंकिंग चार्ज यानी VBC लगाने का भी प्रस्ताव रखा है, जिसका सीधा असर सोलर से होने वाली बचत पर पड़ेगा। अभी लगने वाले जीएससी शुल्क को लेकर भी तस्वीर साफ नहीं है। छोटी हाउसिंग सोसाइटीज के लिए भी मुश्किल खड़ी हो सकती है, क्योंकि वर्चुअल नेट मीटरिंग के लिए न्यूनतम क्षमता 100 किलोवाट रखी जा रही है, जिसके लिए कम से कम 34 सदस्य चाहिए होंगे। इससे कम सदस्यों वाली छोटी सोसाइटी इस सुविधा से बाहर हो जाएंगी। पुराने उपभोक्ताओं को नए फ्रेमवर्क में शिफ्ट करने से जुड़े प्रावधानों पर भी असमंजस है, और कहा जा रहा है कि पुराने उपभोक्ताओं को उनके मूल एग्रीमेंट की पूरी अवधि तक सुरक्षा मिलनी चाहिए। जो फैक्ट्रियां ओपन एक्सेस या कैप्टिव रिन्यूएबल पावर इस्तेमाल करती हैं, उनकी कुल क्षमता को रूफटॉप सोलर के साथ जोड़कर देखने पर वे बिना वजह ऊंची बैंकिंग कैटेगरी में आ सकती हैं।
कुछ और नियम भी परेशानी बढ़ा सकते हैं। 100 किलोवाट से बड़े सोलर सिस्टम के लिए एनर्जी स्टोरेज सिस्टम यानी बैटरी लगाना अनिवार्य करने का प्रस्ताव है, जिससे फैक्ट्रियों और बड़े कमर्शियल उपभोक्ताओं का शुरुआती खर्च काफी बढ़ जाएगा। सोलर से बनी अतिरिक्त बिजली ग्रिड में जमा करने यानी बैंकिंग का नियम भी काफी पेचीदा कर दिया गया है। 3 किलोवाट तक के सिस्टम के लिए सालाना बैंकिंग रहेगी, 3 से 10 किलोवाट के लिए हर महीने निपटारा होगा, 10 से 100 किलोवाट के लिए 4 बैंकिंग स्लॉट मिलेंगे, और 100 किलोवाट से 5 मेगावाट के बीच के सिस्टम के लिए 8 से 12 स्लॉट तय किए गए हैं।