रेल यात्रियों की सुरक्षा दो एजेंसियों के बीच बंटी, RPF और GRP में किसकी जिम्मेदारी?
मोबाइल, लैपटॉप और जान की हिफाजत का जिम्मा रेलवे सुरक्षा बल और लोहमार्ग पुलिस के पास है, पर जवाबदेही का सवाल बना हुआ है।
भारतीय रेल को देश की लाइफलाइन कहा जाता है, लेकिन इसमें सफर करने वालों के मोबाइल, लैपटॉप और दूसरे कीमती सामान की हिफाजत, और उनकी जान की सुरक्षा, दो अलग-अलग व्यवस्थाओं के बीच बंटी हुई है। एक तरफ केंद्र के अधीन रेलवे सुरक्षा बल (RPF) है, तो दूसरी तरफ राज्य सरकारों के अधीन लोहमार्ग पुलिस (GRP)। जिम्मेदारी दो एजेंसियों की है, फिर भी सवाल यही है कि जवाबदेही किसकी है।
सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि रेल अपराधों की जांच और एफआईआर का काम जीआरपी के पास है, मगर वहां वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों की पोस्टिंग कई राज्यों में लंबी अवधि की रणनीति के बजाय कुछ समय की तैनाती बनकर रह गई है।
रेल यात्री सुरक्षा की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिसके पास संसाधन हैं, उसके पास हर अपराध की जांच का अधिकार नहीं है। और जिसके पास जांच का अधिकार है, उसके संसाधन और प्राथमिकताएं राज्य व्यवस्था पर निर्भर हैं। आरपीएफ के पास आधुनिक उपकरण, सुरक्षा बल और रेलवे परिसरों में बड़ी मौजूदगी है। दूसरी ओर बीएनएस से जुड़े अपराधों में एफआईआर दर्ज करने और जांच की मुख्य जिम्मेदारी जीआरपी की है।
कानून के हिसाब से भी दोनों के रास्ते अलग हैं। रेलवे संपत्ति से जुड़े अपराधों पर आरपीएफ रेलवे प्रॉपर्टी (अनलॉफुल पोसेशन) एक्ट के तहत कार्रवाई करती है, जबकि जीआरपी राज्य पुलिस कानूनों और प्रक्रियाओं के तहत काम करती है। दोनों बलों की भूमिका अलग है, लेकिन अपराधी और यात्री के लिए रेलवे एक ही है। इसीलिए डेटा शेयरिंग, संयुक्त गश्त, संयुक्त इंटेलिजेंस और फौरन कार्रवाई के लिए एक स्थायी और साफ राष्ट्रीय व्यवस्था की जरूरत लंबे समय से महसूस की जाती रही है।
जीआरपी में राज्य कैडर के आईपीएस अधिकारियों (एडीजी, आईजी, डीआईजी और एसपी) को प्रतिनियुक्ति पर भेजा जाता है। ज्यादातर राज्यों में आईपीएस अफसरों के लिए जीआरपी की तैनाती एक 'सॉफ्ट' या कम समय की पोस्टिंग बनकर रह गई है। औसतन 8 से 12 महीने में ही एसपी या आईजी स्तर के अधिकारी का ट्रांसफर मेन पुलिसिंग में कर दिया जाता है।
दूसरी तरफ रेलवे अपराधियों का नेटवर्क किसी एक जिले या राज्य तक सीमित नहीं रहता। ट्रेन एक दिन में कई राज्यों को पार करती है और अपराधी भी इसी नेटवर्क का फायदा उठाते हैं। इस 'म्यूजिकल चेयर' का नतीजा यह है कि जब तक कोई अधिकारी रेलवे के जटिल नेटवर्क, अंतरराज्यीय आपराधिक गिरोहों के तरीके और आरपीएफ के साथ तालमेल को समझ पाता है, तब तक उसकी जगह नया चेहरा आ जाता है।
मध्य रेल जोन के तहत जीआरपी के डिवीजनल हेडक्वार्टर मुंबई (छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस), पुणे, नागपुर, औरंगाबाद और मुंबई उपनगरीय में हैं। वहां पुलिस अधीक्षक के तौर पर कमान आईपीएस अधिकारी संभालते हैं। ऐसे में आईपीएस व्यवस्था एक ब्रिज का काम कर सकती है।
अब तीन फैसलों की जरूरत बताई गई है। पहला, न्यूनतम कार्यकाल तय हो: जीआरपी में तैनात वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों को कम से कम 2 वर्ष का स्थिर कार्यकाल मिले, ताकि वे लंबे समय की सुरक्षा योजनाएं लागू कर सकें। दूसरा, दोनों एजेंसियों की भूमिका साफ हो: किस अपराध में कौन एफआईआर दर्ज करेगा, कौन जांच करेगा और कौन कार्रवाई करेगा, यह प्रक्रिया यात्रियों के लिए भी सीधी और सरल हो। तीसरा, रेलवे सुरक्षा के लिए विशेष फंड: जीआरपी की रेलवे से जुड़ी जरूरतों को देखते हुए केंद्र और राज्यों के बीच तालमेल वाली वित्तीय व्यवस्था बने, ताकि सीसीटीवी, साइबर इंटेलिजेंस, डेटा एनालिटिक्स और आधुनिक जांच तंत्र मजबूत हो सकें।
सवाल सिर्फ अपराध का नहीं, पूरी व्यवस्था का है। रेलवे देश की सबसे बड़ी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था है और यहां सुरक्षा केवल आरपीएफ या जीआरपी की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि केंद्र और राज्यों के बीच असरदार समन्वय का मामला है। जब ट्रेन राज्य की सीमा नहीं मानती, तो अपराध की जांच राज्य की सीमा में क्यों अटके? जब तक इस सवाल का नीतिगत जवाब नहीं मिलता, तब तक पटरियों पर दौड़ती ट्रेनों के साथ 'दोहरी कमान' और 'म्यूजिकल चेयर' की व्यवस्था भी चलती रहेगी।