पितृपक्षः मुंडन कब करें, लग्न के साल श्राद्ध-तर्पण का क्या नियम है
पितृपक्ष शुरू होते ही मुंडन और श्राद्ध को लेकर लोगों के मन में जो सवाल रहते हैं, उनका धर्मशास्त्र के मुताबिक जवाब।
रविवार, 27 सितंबर से पितृपक्ष शुरू हो गया है। कई जगहों पर 26 सितंबर को ही पौर्णिमा श्राद्ध हो चुका है। इस पूरे पखवाड़े को लेकर कुछ नियम माने जाते हैं, जिनका पालन करने से पूर्वज खुश होकर आशीर्वाद देते हैं। अक्सर देखा जाता है कि लोग अपने पूर्वजों के श्राद्ध वाले दिन मुंडन करवाते हैं, यानी बाल कटवाते हैं। लेकिन जिस साल घर में बेटे या बेटी की शादी हुई हो, उस साल तर्पण और श्राद्ध करना चाहिए या नहीं, इसे लेकर बहुत से लोगों के मन में उलझन रहती है। धर्मशास्त्र में इस बारे में क्या कहा गया है, यह जानना जरूरी है।
ज्योतिषियों के मुताबिक, श्राद्ध पक्ष की शुरुआत में या इसके दौरान, यानी प्रतिपदा से सर्वपितृ अमावस्या के बीच, पूर्वजों के लिए सिर का मुंडन नहीं करवाना चाहिए। धर्मसिंधू में लिखा है कि पितृपक्ष के श्राद्ध वाले दिन मुंडन करवाने से बाल पूर्वजों के मुंह में चले जाते हैं। इस स्थिति से बचने के लिए पितृपक्ष शुरू होने से एक दिन पहले, या फिर सर्वपितृ अमावस्या के दिन दोपहर में मुंडन करवा लेना चाहिए।
घर में शादी हो चुकी हो तो श्राद्ध करें या नहीं, यह सवाल भी अक्सर पूछा जाता है। ज्योतिषियों का कहना है कि इस साल बेटे या बेटी की शादी हुई हो, तब भी पितृपक्ष में पूर्वजों के लिए तर्पण, पिंडदान, श्राद्ध जैसे विधि-विधान करने चाहिए। शादी जैसे शुभ कार्य का समय और पितृकर्म, दोनों का धार्मिक स्वरूप अलग-अलग है। इसलिए सिर्फ शादी तय हो गई है, इस वजह से पूर्वजों की तिथि के हिसाब से होने वाला श्राद्ध या तर्पण रोक देना चाहिए, ऐसा कोई आम नियम नहीं माना जा सकता। हां, अगर शादी की तारीख नजदीक हो या उसी दौरान कोई और धार्मिक रस्म भी हो, तो घर के पुरोहित की सलाह के मुताबिक ही विधियों की प्लानिंग करनी चाहिए।
जनेऊ या शादी जैसे शुभ मौकों से पहले नंदीमुख श्राद्ध किया जाता है, ताकि घर में होने वाले शुभ कार्यों में कोई रुकावट न आए। पितृपक्ष साल में एक ही बार आता है, इसलिए पूर्वजों को खुश और संतुष्ट रखना जरूरी माना जाता है। कहा जाता है कि देवी-देवताओं की पूजा में हुई गलतियां माफ हो जाती हैं, लेकिन पूर्वजों का सम्मान न करने या उन्हें नजरअंदाज करने से पितृदोष लग जाता है, जिससे पूर्वज नाराज हो जाते हैं और इसका असर परिवार पर बीमारी, दुख और दूसरी परेशानियों के रूप में पड़ता है।
जिन लोगों को अपने पूर्वजों की मृत्यु की सही तारीख नहीं पता, उन्हें सर्वपितृ अमावस्या के दिन उनके लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर लेना चाहिए।
पितृपक्ष असल में पूर्वजों की पूजा और उन्हें प्रसन्न करने के लिए मनाया जाने वाला पर्व है, इसे लेकर दुखी होने की कोई जरूरत नहीं है, इसे खुशी के साथ मनाना चाहिए। शास्त्र में कहा गया है, "मातृ देवो भव, पितृ देवो भव।" यानी मां-बाप जैसा कोई दूसरा देवता नहीं होता, उनके आशीर्वाद से ही सारे सुख मिलते हैं। पितृपक्ष में रोज उनकी प्रार्थना करनी चाहिए और शुभ मुहूर्त में पिंडदान करना चाहिए, साथ ही अन्न और वस्त्र का दान करना चाहिए।