मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

अभी सब्सक्राइब करें
प्राइम अलर्ट
सारे लाइव अपडेट
18:00 IST

पितृपक्ष: श्राद्ध की सही तिथि और समय कैसे तय करें, अकाल मृत्यु से लेकर पहले साल तक के नियम

पितृपक्ष 26 सितंबर से शुरू होकर सर्वपितृ अमावस्या यानी 10 अक्टूबर को खत्म होगा, इससे पहले श्राद्ध से जुड़े कुछ जरूरी नियम जान लीजिए

पितृपक्ष: श्राद्ध की सही तिथि और समय कैसे तय करें, अकाल मृत्यु से लेकर पहले साल तक के नियम
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

हिंदू धर्म में पितृपक्ष पूर्वजों को समर्पित एक बहुत अहम समय माना जाता है। इस दौरान लोग अपने पुरखों की आत्मा को शांति और सम्मान देने के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे विधि-विधान करते हैं। मान्यता है कि पितृपक्ष में तय नियमों के मुताबिक श्राद्ध करने से पूर्वजों का आशीर्वाद मिलता है, इसलिए लोग अपने पुरखों की मृत्यु की तारीख के हिसाब से श्राद्ध करते हैं।

इस बार पितृपक्ष शनिवार, 26 सितंबर से शुरू हो रहा है और शनिवार, 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ खत्म होगा। ऐसे में पितृपक्ष शुरू होने से पहले यह समझना जरूरी है कि श्राद्ध किन तारीखों और किस समय नहीं करना चाहिए। इसके लिए कुछ खास नियम बताए गए हैं और कुछ खास तारीखों, समय और हालात में नियमित श्राद्ध टालने की सलाह दी जाती है।

मृत्यु के बाद पहले साल के लिए हिंदू परंपरा में मृतक के लिए अलग-अलग विधि होती है। अंतिम संस्कार के बाद दसवें, बारहवें या तेरहवें दिन के विधि, हर महीने का श्राद्ध और साल भर बाद का वर्षश्राद्ध, ये सब अलग-अलग परंपराएं हैं। कुछ रीति-रिवाजों में पहले साल नियमित पितृपक्ष के श्राद्ध की बजाय मृत्यु के बाद के इन्हीं विधि-विधानों को ज्यादा अहमियत दी जाती है। हालांकि यह तरीका जाति, इलाके, संप्रदाय और घर की परंपरा के हिसाब से बदल सकता है।

जिस व्यक्ति की मौत अकाल या असामान्य तरीके से हुई हो, उसके लिए मान्यता के मुताबिक पितृपक्ष की चतुर्दशी तिथि पर खास श्राद्ध किया जाता है। कहीं-कहीं इसे 'चतुर्दशी का श्राद्ध' या 'घात चतुर्दशी का श्राद्ध' कहते हैं। एक्सिडेंट, हथियार से चोट लगने या किसी और असामान्य वजह से जान गंवाने वालों के लिए यह तिथि खास मानी जाती है।

मान्यता के अनुसार श्राद्ध सूरज डूबने के बाद या रात में नहीं करना चाहिए। श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के लिए दिन का एक खास समय ही सही माना जाता है, इसलिए विधि करने से पहले स्थानीय पंचांग देखकर श्राद्ध का मुहूर्त तय करने की परंपरा है।

परंपरा के मुताबिक श्राद्ध के लिए दिन का अपराह्न समय यानी दोपहर के बाद का वक्त सही माना जाता है। सुबह या रात में श्राद्ध करने की बजाय स्थानीय पंचांग और घर की परंपरा देखकर सही मुहूर्त चुनने का रिवाज है। श्राद्ध की तिथि तय करते वक्त सिर्फ अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि हिंदू पंचांग की तिथि और उस दिन का अपराह्न काल भी देखा जाता है।

अगर किसी वजह से मृतक की श्राद्ध तिथि पता न हो या तिथि छूट गई हो, तो ऐसे में सर्वपितृ अमावस्या को खास अहमियत दी जाती है। इस दिन जाने-अनजाने सभी पूर्वजों को याद करके श्राद्ध, तर्पण या पिंडदान करने की प्रथा है। तिथि को लेकर कोई कन्फ्यूजन हो तो स्थानीय पंचांग देखकर या जानकार पुरोहित की सलाह लेकर विधि करना सही माना जाता है।

क्या हम इस विज़िट को गिन लें? PT24 गूगल एनालिटिक्स से देखता है कि कौन सी खबरें किस पर पढ़ी जाती हैं। आपके हां कहने तक यह बंद है, आप सोच रहे हैं तब तक कुछ नहीं गिना जाता, और आप You पर कभी भी अपना मन बदल सकते हैं। हम क्या लेंगे