पितृपक्ष: ऑनलाइन श्राद्ध-पिंडदान करना शास्त्र के हिसाब से सही है या गलत, जानिए नियम
पितृपक्ष शुरू होते ही लोग पूर्वजों के श्राद्ध-तर्पण की तैयारी में लग जाते हैं, ऐसे में जो लोग तीर्थ नहीं जा पाते उनके लिए ऑनलाइन विधि कितनी सही है, ज्योतिष इस पर क्या कहते हैं।
पितृपक्ष शुरू होते ही लोग अपने पूर्वजों को याद करने लगते हैं और श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान की तैयारी में जुट जाते हैं। इन दिनों में लोग अपने पूर्वजों की शांति और मुक्ति के लिए प्रार्थना करने गया, काशी, प्रयागराज और मथुरा जैसे धार्मिक शहरों में जाते हैं। लेकिन आजकल हर किसी के लिए इन तीर्थस्थानों तक पहुंचना आसान नहीं रह गया है। यही वजह है कि कुछ लोग अब घर बैठे ऑनलाइन श्राद्ध और पिंडदान करने का रास्ता चुन रहे हैं। इसी से यह सवाल भी उठता है कि ऑनलाइन श्राद्ध करना शास्त्र के हिसाब से सही है या नहीं, और क्या इससे पूजा का पूरा फल मिलता है।
सनातन धर्म में पितृपक्ष का खास महत्व माना जाता है। इस साल पितृपक्ष रविवार, 27 सितंबर से शुरू हो रहा है और 10 अक्टूबर को सर्वपित्री अमावस्या के दिन खत्म होगा। इन 15 दिनों में लोग अपने पूर्वजों के लिए श्राद्ध और पिंडदान करते हैं। पूर्वजों की शांति और मुक्ति के लिए खास तीर्थस्थान जाकर श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने को अहमियत दी जाती है।
आजकल बिजी शेड्यूल और वक्त की कमी के चलते कई लोग घर से ही डिजिटल तरीके से श्राद्ध विधि कर लेते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि सनातन धर्म के नियमों के हिसाब से डिजिटल माध्यम से श्राद्ध करना ठीक नहीं है। ज्योतिषों का कहना है कि इस तरह श्राद्ध करने से पूजा का पूरा फल नहीं मिलता।
वहीं अगर कोई इंसान काशी, प्रयागराज, मथुरा, द्वारका, हरिद्वार या गया जैसे तीर्थस्थानों तक नहीं पहुंच पाता, तो श्राद्ध विधि घर पर या पास के किसी तालाब पर भी की जा सकती है। धर्मग्रंथों के मुताबिक श्राद्ध और तर्पण भक्ति भाव से किए जाने वाले विधि-विधान हैं। इसलिए कोई भी इंसान अपनी सुविधा के हिसाब से सही जगह पर अपने पूर्वजों के लिए भक्ति भाव से श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण कर सकता है।
श्राद्ध और तर्पण करते वक्त पवित्रता का खास ध्यान रखना चाहिए। इसके लिए पिंडदान और तर्पण जैसे विधि-विधान नहाकर और साफ कपड़े पहनकर ही करने चाहिए। इस दौरान हाथ में कुश की घास पकड़ने की भी परंपरा है। इसके बाद पूर्वजों को याद करते हुए दाहिने हाथ के अंगूठों के बीच से पानी अर्पित किया जाता है। परंपरा के मुताबिक तर्पण करते वक्त विधि और भक्ति का पालन करना जरूरी माना जाता है।
पिंडदान और श्राद्ध विधि के बाद ब्राह्मण को भोजन कराने की भी एक परंपरा है। ब्राह्मण को भोजन कराने से पहले गाय, कौआ, कुत्ता और चींटी के लिए खाना अलग रखने की सलाह दी जाती है। ऐसा माना जाता है कि ऐसा करने से पूर्वजों का आशीर्वाद परिवार के साथ बना रहता है।