पितृपक्ष में श्राद्ध-तर्पण के लिए स्टील-लोहे के बर्तन क्यों नहीं होते इस्तेमाल, जानें वजह
पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध के लिए किस धातु के बर्तन शुभ माने जाते हैं और स्टील-लोहा क्यों वर्जित है, जानिए परंपरा।
पितृपक्ष भाद्रपद पूर्णिमा या आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होता है और अमावस्या पर खत्म होता है। इस बार तर्पण और श्राद्ध विधि रविवार, 27 सितंबर से शुरू होंगे और शनिवार, 10 अक्टूबर को पितरों को विदाई दी जाएगी। इन 16 दिनों में पूर्वजों को पानी अर्पित करने और श्राद्ध विधि करने की खास परंपरा चली आ रही है।
हिंदू धार्मिक मान्यता के मुताबिक इन दिनों में श्रद्धा से पितरों को जल अर्पित करने और उनके नाम पर दान-पुण्य करने से उनका आशीर्वाद मिलता है और पितृदोष से मुक्ति मिलती है। परंपरा में तर्पण विधि के लिए इस्तेमाल होने वाले बर्तन को भी खास अहमियत दी जाती है। यहां जानते हैं कि श्राद्ध विधि और तर्पण के लिए कौन सी धातु के बर्तन इस्तेमाल करने चाहिए।
धार्मिक परंपरा के मुताबिक तर्पण और श्राद्ध विधि के लिए चांदी के बर्तन इस्तेमाल करना सबसे बढ़िया माना जाता है। हिंदू धर्म और ज्योतिष के हिसाब से चांदी सबसे पवित्र और शुद्ध धातु मानी जाती है और इसका संबंध चंद्रमा से है। तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोज के लिए चांदी के बर्तन का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
अगर घर में चांदी के बर्तन न हों तो पीतल, तांबे या कांसे के बर्तन भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं। ज्योतिष के मुताबिक तांबे का संबंध सूर्य और मंगल ग्रह से, पीतल का गुरु ग्रह से और कांसे का बुध और शुक्र ग्रह से माना जाता है। इन धातुओं के बर्तन तर्पण, पिंडदान या ब्राह्मण भोज में इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
अगर तांबे, पीतल या कांसे के बर्तन भी उपलब्ध न हों तो थाली और कटोरी का इस्तेमाल किया जा सकता है। साथ ही यह भी ध्यान रखें कि श्राद्ध विधि में सिर्फ गाय का दूध, घी और दही इस्तेमाल करें और इन्हें कभी सीधे जमीन पर न रखें। इसके लिए कुशासन का इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर कुशासन न हो तो घोंगड़ी, ऊनी, लकड़ी या रेशमी कपड़ा बिछाया जा सकता है।
पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध विधि के लिए स्टील या लोहे के बर्तन इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। कई लोग तर्पण और ब्राह्मण भोज के लिए स्टील या लोहे के बर्तन इस्तेमाल करते हैं, जो सही नहीं माना जाता। पितृपक्ष में स्टील या लोहे के बर्तन इस्तेमाल करने की सख्त मनाही है। इसके अलावा कांच या प्लास्टिक के बर्तन भी नहीं इस्तेमाल करने चाहिए, क्योंकि इन्हें नेगेटिव एनर्जी और अशुद्धता से जोड़कर देखा जाता है।
पितृपक्ष के 16 दिनों में तर्पण करने के लिए सुबह नहा-धोकर साफ कपड़े पहनें। इसके बाद किसी शांत जगह बैठकर अपने पूर्वजों को याद करें। एक साफ बर्तन में पानी भरकर उसमें काला तिल डालें। परंपरा के मुताबिक तर्पण करते वक्त पानी दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके अर्पित किया जाता है। इसके बाद अपने पूर्वजों का नाम और गोत्र याद करके श्रद्धा से पानी अर्पित करें। आमतौर पर यह पानी हथेलियों से धीरे-धीरे बहाया जाता है। तर्पण करते वक्त अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान और आभार की भावना बनाए रखनी चाहिए।
तर्पण करने के बाद अपनी सामर्थ्य के मुताबिक पूर्वजों के नाम पर अन्न, अनाज, कपड़े या दूसरी चीजें दान करना शुभ माना जाता है। जरूरतमंदों, ब्राह्मणों या गायों को दान देने की परंपरा भी कई घरों में चली आ रही है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक श्राद्ध विधि सिर्फ एक रस्म नहीं है, बल्कि यह पूर्वजों के प्रति सम्मान, आभार और उनकी याद जताने का एक मौका है।