पितृपक्ष में अविधवा नवमी 4 अक्टूबर को, पति से पहले गुजरी महिलाओं का श्राद्ध
पितृपक्ष की नवमी तिथि, यानी अविधवा नवमी, इस बार 4 अक्टूबर को है। इसे मातृ नवमी भी कहा जाता है।
पितृपक्ष के दौरान अलग-अलग तिथियों पर पूर्वजों की याद में श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। इसी दौरान आने वाली अविधवा नवमी को विवाहित स्त्रियों की स्मृति से जुड़ी अहम तिथि माना जाता है। इस साल अविधवा नवमी 4 अक्टूबर को है।
कुछ परंपराओं में पितृपक्ष की नवमी तिथि को अविधवा नवमी, सवाष्णी नवमी या मातृ नवमी कहा जाता है। कुछ परिवारों में यह परंपरा मिलती है कि जिन महिलाओं का निधन पति से पहले हुआ, उनकी याद में इस दिन श्राद्ध किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि उनकी आत्मा की शांति के लिए इस दिन श्राद्ध, तर्पण और दान किया जाता है। इस तिथि को सुहागिनों का पूजन भी कहा जाता है।
कुछ जगहों पर इस दिन उन पूर्वज महिलाओं की याद में किसी सुहागिन महिला को घर बुलाकर भोजन कराने की प्रथा भी है। कुछ भागों में उसका पूजन करके उसे खाना खिलाया जाता है। उसे हल्दी-कुमकुम, फूल, कपड़े या सौभाग्य की चीजें देने का चलन भी मिलता है। माना जाता है कि इसके पीछे दिवंगत स्त्री को याद करने और उसके सौभाग्य का सम्मान करने की भावना है। कुछ जगहों पर सुहागिन को भोजन कराकर उसका आशीर्वाद लिया जाता है।
परिवार की परंपरा के हिसाब से इस दिन श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान या अन्नदान किया जाता है। विधियों के तरीके इलाके, समाज और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।
पितृपक्ष में अन्न, अनाज, कपड़े और जरूरतमंदों के काम की चीजें दान करने को धार्मिक महत्त्व दिया जाता है। अविधवा नवमी के दिन भी कुछ परिवारों में अपनी क्षमता के मुताबिक दान-धर्म करने की परंपरा है।
अविधवा नवमी को सिर्फ एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि दिवंगत परिजनों की याद, कृतज्ञता और उनकी यादों को सहेजने की परंपरा के रूप में भी देखा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा से किया गया श्राद्ध, तर्पण और दान पितरों को अर्पित करने से उनका आशीर्वाद मिलता है।
धर्म, ज्योतिष, वास्तु और फेंगशुई जैसे विषयों के लेख सिर्फ पाठकों की जानकारी के लिए हैं। इनसे जुड़ा कोई भी प्रयोग करने से पहले जानकारों की सलाह जरूरी है।