पितृपक्ष: गरुड पुराण के मुताबिक मरने के बाद भी लगती है भूख-प्यास, जानें श्राद्ध-तर्पण का राज
गणपति उत्सव खत्म होते ही आज 27 सितंबर से पितृपक्ष शुरू हो गया है, ऐसे में गरुड पुराण के हवाले से श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण के पीछे की मान्यता सामने आई है।
गणपति उत्सव की धूमधाम खत्म होते ही आज यानी 27 सितंबर से पितृपक्ष की शुरुआत हो चुकी है। इस मौके पर अक्सर यह सवाल उठता है कि मरने के बाद इंसान का क्या होता है, शरीर छोड़ने के बाद भी क्या भूख और प्यास लगती है, और श्राद्ध के वक्त अन्न-पानी चढ़ाने की परंपरा के पीछे आखिर वजह क्या है। हिंदू धर्म में गरुड़ पुराण के जरिए भगवान विष्णु ने खुद अपने वाहन गरुड़ से बातचीत करते हुए इन सवालों के जवाब दिए हैं। इसी में यह भी बताया गया है कि मौत के बाद किए जाने वाले श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण की असली वजह क्या है।
श्राद्ध शब्द श्रद्धा से बना है, यानी पुरखों के प्रति आदर और शुक्रगुजारी जताना। गरुड़ पुराण के मुताबिक श्राद्ध के वक्त जो नैवेद्य चढ़ाया जाता है, वह पूरे साल सूक्ष्म रूप में पुरखों को संतुष्ट रखता है। मान्यता है कि इससे वे खुश होकर परिवार को सुख-शांति, समृद्धि और संतान का आशीर्वाद देते हैं।
पुरखों को प्रसन्न करने के लिए तर्पण भी किया जाता है। इसमें कुशा घास, काले तिल और जौ हाथ में लेकर पानी के साथ पुरखों को अर्पित किया जाता है। गरुड़ पुराण के अनुसार इस तरह चढ़ाया गया पानी उनकी प्यास बुझाता है। वहीं मोक्ष पाने या आत्मा के आगे के सफर में मदद के लिए गया, हरिद्वार, प्रयागराज जैसे तीर्थस्थानों पर पिंडदान किया जाता है, माना जाता है कि इससे दिवंगत आत्मा भौतिक बंधनों और मोह-माया से मुक्त हो जाती है। कई जगहों पर यह भी माना जाता है कि पिंडदान हो जाने के बाद पुरखों या मृत व्यक्ति के लिए अलग से श्राद्ध या तर्पण करने की जरूरत नहीं रहती।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मौत के बाद सच में भूख-प्यास लगती है। गरुड़ पुराण के मुताबिक जब किसी की मौत के बाद आत्मा शरीर छोड़कर यमलोक के मुश्किल सफर पर निकलती है, तब उसे भूख और प्यास लगती है। इस सफर को पूरा करने के लिए उसे ऊर्जा चाहिए होती है, जो उसे परिवार वालों के किए गए पिंडदान से मिलती है। यही वजह है कि मौत के बाद दस दिन तक पिंड चढ़ाने से आत्मा को यमलोक का लंबा सफर तय करने की ताकत मिलती है।
इसी वजह से मौत के बाद 13 दिन तक ये रस्में रोज निभाई जाती हैं। गरुड़ पुराण के मुताबिक 13वें दिन के बाद भी पितृलोक में गए लोगों को संतुष्ट रखना जरूरी होता है। इसीलिए पितृपक्ष में दिवंगत आत्मा की शांति के लिए परिवार के लोग तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करते हैं। गरुड़ पुराण के मुताबिक ये रस्में सिर्फ पुरखों की आत्मा की शांति के लिए ही नहीं, बल्कि उनका कर्ज चुकाने और उनका सफर सुखद बनाने के लिए भी की जाती हैं।