पंढरपूर विठ्ठल मंदिर 3 दिन बंद, ASI की केमिकल लेपन प्रक्रिया शुरू
विठ्ठल-रुक्मिणी की मूर्तियों पर पुरातत्व विभाग की वज्रलेप प्रक्रिया शुरू, भाविकों का दर्शन 3 दिन के लिए बंद
पंढरपुर के श्री विठ्ठल-रुक्मिणी मंदिर में रोज राज्यभर से लाखों वारकरी और भाविक बड़ी श्रद्धा से दर्शन के लिए आते हैं। लेकिन कल से अगले 3 दिन तक विठ्ठल और रुक्मिणी माता का दर्शन भाविकों के लिए पूरी तरह बंद रहेगा। इसकी वजह है भारतीय पुरातत्व विभाग (ASI) की तरफ से मूर्तियों पर की जाने वाली खास रासायनिक लेपन प्रक्रिया।
साल के बारहों महीने पंढरपुर में भाविकों की भारी भीड़ लगी रहती है। लाखों वारकरियों का लगातार चरणस्पर्श, मूर्ति पर होने वाला दुग्धाभिषेक, और मौसम में बदलाव व नमी की वजह से विठ्ठल और रुक्मिणी माता की मूर्ति की काफी झीज हो रही थी। इस वजह से मंदिर समिति और पूरे वारकरी संप्रदाय में चिंता का माहौल बन गया था।
असल में यह लेपन प्रक्रिया आषाढी एकादशी से पहले ही पूरी होनी चाहिए थी। लेकिन कुछ भाविकों ने इस रासायनिक लेपन प्रक्रिया के खिलाफ कोर्ट में याचिका दाखल कर दी थी, जिसकी वजह से यह प्रक्रिया करीब 3 महीने के लिए टल गई। आखिरकार मुंबई हाई कोर्ट की कोल्हापुर बेंच ने इस प्रक्रिया को मंजूरी दे दी और इस लेपन का रास्ता साफ हो गया।
श्री विठ्ठल-रुक्मिणी मंदिर समिति के कार्यकारी अधिकारी श्रीकांत यादव के मुताबिक, 22 सितंबर की रात शेजारती होने के बाद भारतीय पुरातत्व विभाग की एक्सपर्ट टीम काम शुरू करेगी। आज रात दोनों मूर्तियों की शास्त्रीय तरीके से गहरी सफाई की जाएगी, और कल से असली लेपन का काम शुरू होगा।
इस पूरी प्रक्रिया का मकसद है मूर्ति की उम्र बढ़ाना और उसका लंबे समय तक जतन व संरक्षण करना। जहां-जहां मूर्ति का हिस्सा घिस गया है या बारीक दरारें आई हैं, वहां उसी तरह के मूल पत्थर का चूरा इस्तेमाल करके वो जगह भरी जाएगी।
भाविकों के बार-बार चरणस्पर्श की वजह से विठ्ठल मूर्ति के पैरों की सबसे ज्यादा झीज हुई है। इसलिए पुरातत्व विभाग को विठुराया के पैरों पर खास ध्यान देकर बड़ी मरम्मत करनी पड़ेगी। झीज पूरी तरह भरने के बाद मूर्ति पर खास रासायनिक लेप लगाया जाएगा।
इस प्रक्रिया को वज्रलेप कहा जाता है। लेकिन आजकल पुरातत्व विभाग मंजूरीशुदा अत्याधुनिक रासायनिक सुरक्षा लेप की सिफारिश करता है। इस लेपन में मुख्य रूप से इपॉक्सी राल, मूल पत्थर का पाउडर और पानी न रिसने वाले सिलिकॉन आधारित पदार्थ इस्तेमाल किए जाते हैं। इन चीजों से मूर्ति पर एक सुरक्षा कवच तैयार होता है, जिससे आगे चलकर पत्थर की झीज रोकने में मदद मिलती है।