ओटी, आहेर, दुखवटा, गारवा, परडी और वाण जैसी रस्मों के पीछे के रिवाज और मान्यताएं
महाराष्ट्र के कई घरों में शादी-ब्याह, त्योहार और सुख-दुख के मौकों पर आज भी ये पुरानी परंपराएं निभाई जाती हैं।
महाराष्ट्र के बहुत से परिवारों में शादी, त्योहार, समारोह और सुख-दुख के मौकों पर कुछ खास रीति-रिवाज आज भी निभाए जाते हैं। ओटी भरना, आहेर करना, दुखवटा देना, गारवा लाना, परडी छोड़ना और वाण देना, इन रस्मों के पीछे सिर्फ धार्मिक श्रद्धा नहीं, बल्कि रिश्ते निभाने, परंपरा बचाए रखने, सम्मान जताने और मुश्किल वक्त में परिवार का साथ देने की भावना भी दिखती है। इन रिवाजों का कोई एक तय नियम नहीं है, अलग-अलग गांव, इलाके, जाति-समुदाय और परिवार की परंपरा के हिसाब से इनके तरीके बदलते रहते हैं।
ओटी भरना खासतौर पर सुहागिन औरतों के सम्मान से जुड़ी रस्म मानी जाती है। ओटी में चावल, हल्दी की गांठ, नारियल, फल, खण या कपड़ा और कुछ जगहों पर दक्षिणा भी दी जाती है। अधिक मास में शादीशुदा बेटी के अपनी मां की ओटी भरने की परंपरा कई परिवारों में देखी जाती है। इसके अलावा सावन के महीने में शुक्रवार को औरतें अपने घर हल्दी-कुंकू का आयोजन कर ओटी भरने का कार्यक्रम भी करती हैं। छोटे हल्दी-कुंकू कार्यक्रमों से लेकर बड़ी शादियों तक यह रस्म आज भी आम है। कई जगह सुहागिनों को नारियल, कपड़ा, चावल या गेहूं और बालों में लगाने के लिए गजरे देकर पूरी ओटी दी जाती है, जिसमें नारियल को संतान प्राप्ति के लिए शुभ माना जाता है। वहीं कई जगह कुंवारी और विधवा औरतों को कपड़े का एक टुकड़ा और चावल या गेहूं देने की भी परंपरा है। पश्चिम महाराष्ट्र में सांगली, सातारा और कोल्हापुर इलाके में अंगूर के बागों की भी ओटी भरी जाती है, जिसमें पांच या सात सुहागिन औरतें मिलकर अंगूर के पांच पेड़ों को हल्दी-कुंकू लगाती हैं और एक पेड़ को साड़ी पहनाई जाती है, फिर तैयार अंगूर के गुच्छे हर औरत की ओटी में रखे जाते हैं। महाराष्ट्र के कई हिस्सों में नदी की भी ओटी भरी जाती है, नदी को साड़ी पहनाकर हल्दी-कुंकू लगाने की रस्म निभाई जाती है।
किसी खुशी के मौके पर रिश्तेदार या करीबी को तोहफा, नकद रकम या काम की चीज देकर सम्मान करना आहेर करना कहलाता है। शादी में दूल्हा-दुल्हन, उनके माता-पिता या करीबी रिश्तेदारों को आहेर देने की परंपरा कई जगह है। महाराष्ट्र में औरतों को साड़ी-ओटी और पुरुषों को तौलिया, टोपी और कपड़े का आहेर दिया जाता है। कुछ जगह पुरुषों को शाल-श्रीफल यानी शाल और नारियल भी दिया जाता है। कई जगह मान-सम्मान के तौर पर पगड़ी बांधने की भी परंपरा है। नकद रकम देते वक्त आमतौर पर बंद लिफाफे में देने का रिवाज है। अब जमाना बदलने के साथ आहेर का स्वरूप भी तोहफे में बदल गया है, जिसमें चीज की कीमत से ज्यादा अपनापन और रिश्ते का सम्मान मायने रखता है। कई जगह महाराष्ट्र में बोरवेल और कुएं बनने के बाद भी उन्हें आहेर की साड़ी चढ़ाई जाती है।
अपने रिश्तेदार, दोस्त या पड़ोसी के घर किसी की मौत होने पर परिवार के प्रति संवेदना जताने का तरीका दुखवटा देना कहलाता है। मरने वाले के घर जाकर परिवार को हिम्मत देना, चुपचाप श्रद्धांजलि देना और हो सके तो जरूरत के वक्त मदद करना, इसके पीछे की सामाजिक भावना है। मौत हुए परिवार में दुख की वजह से और कुछ जगह ऐसी परंपरा होने से कुछ दिन उस घर में खाना नहीं बनता, कोई खुशी का मौका नहीं मनाया जाता। ऐसे में कई गांवों में आज भी रिश्तेदार या दोस्त मरने वाले के घर खाना, चाय-पानी वगैरह लेकर जाते हैं। पश्चिम महाराष्ट्र के कुछ गांवों में आज भी यह परंपरा है कि मरने वाले के घर पड़ोसी और रिश्तेदार तेरह से पंद्रह दिन तक रोज सुबह-शाम का खाना अपने घर बनाकर ले जाते हैं और दुखी परिवार को हिम्मत देने के लिए उनके साथ बैठकर खाना खाते हैं। कई गांवों में यह प्यार और सांत्वना की अनोखी परंपरा देखने को मिलती है, जो शहरों की भागदौड़ भरी जिंदगी में अब कम होती जा रही है।
गांव के महाराष्ट्र में चलन में रही गारवा लाना या गारवा ले जाना नाम की रस्म का मतलब शब्द से ही साफ है, यानी माहौल में, शरीर में और मन में ठंडक पहुंचाना। कई जगह शुभ मौकों पर गारवा ले जाने की परंपरा निभाई जाती है। शादी से पहले दुल्हन पक्ष से दूल्हा पक्ष को और दूल्हा पक्ष से दुल्हन पक्ष को गारवा देने का रिवाज है। शादी के गारवे में ज्यादातर शरीर को ठंडक देने वाली चीजें दी जाती हैं, जैसे दही-भात, केला, आंबील, मूंग से बनी चीजें वगैरे, और आज भी इसमें कई तरह की चीजें शामिल होती हैं। शादी के अलावा घर की भूमि पूजा, बोरवेल या कुएं की पानी पूजा, चौखट पूजा और वास्तु शांति में भी गारवा ले जाने का रिवाज खूब चलता है, जिसमें आंबील, फल, पूरन पोली, दही-भात वगैरे ले जाने की परंपरा है। ऐसी मान्यता है कि घर बनने की पूजा के लिए गारवा बहन या बुआ को लाना होता है, और वास्तु बनाते वक्त दही-भात वास्तु के चारों तरफ छिड़का जाता है, जिससे वास्तु शांत हो जाती है और कोई दिक्कत नहीं आती, ऐसा माना जाता है।
परडी छोड़ने की रस्म भी गांव के इलाकों में ज्यादा देखने को मिलती है। यह परडी पानी के स्रोतों के पास छोड़ी जाती है, जैसे कुआं, नाला, नदी, तालाब, खेत का तालाब, बोरवेल। गेहूं या ज्वार के डंठल या चिपाड़ (जिन पर गेहूं-ज्वार लगते हैं वे सूखे पौधे) पांच या सात कोने बनाकर सुतली से बांधे जाते हैं। इस पर पूरन पोली का नैवेद्य, सात केले, सात सुपारी, सात लौंग, सात हल्दी की गांठें, सात दीये और सात गेहूं की पोटलियां प्रसाद के रूप में रखी जाती हैं। ऐसी मान्यता है कि पानी के स्रोतों में सात आसरा यानी सात देवियां होती हैं, और इन देवियों को खुश करने या उस पानी के स्रोत में किसी की जान न जाए, इसलिए यह परडी छोड़ने की मान्यता है। यह परडी नदी या कुएं में छोड़ी जाती है, कुछ जगह इस पर रखे नैवेद्य को प्रसाद के तौर पर खाया भी जाता है। पानी के स्रोत पर नारियल भी फोड़ा जाता है। कुछ जगह बीमारी दूर करने के लिए भी परडी उतारकर छोड़ने की परंपरा है, और कुछ मान्यताओं के मुताबिक सिर्फ पुरुष ही यह परडी पानी की जगह पर छोड़ सकते हैं।
वाण देने की यह रस्म खासतौर पर हल्दी-कुंकू, मकर संक्रांति या दूसरे धार्मिक मौकों पर सुहागिन और नई शादीशुदा औरतों में चलन में है। फल, अनाज, सुहाग की चीजें या काम की चीजें देकर एक-दूसरे को शुभकामनाएं दी जाती हैं। अधिक मास में ब्राह्मण को थाली में अनारसे, निरांजन, बताशे वगैरे दिए जाते हैं। मकर संक्रांति में खासतौर पर दामाद को चांदी-सोने की चीजें तोहफे में दी जाती हैं, दामाद को संक्रांति पर चांदी की कटोरी में तिल-गुड़ और बहू को हलवे के गहने भी दिए जाते हैं। कुछ परंपराओं में वाण देते वक्त साड़ी के पल्लू का सहारा लेकर देने का तरीका बताया जाता है। दशहरे पर आपटे के सोने के पत्ते दामाद को वाण के तौर पर देने की भी परंपरा है।
इन सभी रीति-रिवाजों को देखते हुए एक बात याद रखना जरूरी है कि यह प्रथाएं श्रद्धा और संस्कृति का हिस्सा हैं, जरूरी नहीं कि हर घर में हर इलाके में बिल्कुल इसी तरह निभाई जाएं। इसलिए परिवार की परंपरा, स्थानीय रिवाज और मौके को समझते हुए ही यह रस्में निभाई जाती हैं।