मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

अभी सब्सक्राइब करें
प्राइम अलर्ट
सारे लाइव अपडेट
19:46 IST

निर्वाणषटकम्: खुद की पहचान कराने वाला छह श्लोकों का स्तोत्र, जानिए कब करें पठन

आद्य शंकराचार्य का माना जाने वाला निर्वाणषटकम् छह श्लोकों का स्तोत्र है। इसमें 'शिवोऽहम्' का अर्थ और पठन के समय बताए गए हैं।

निर्वाणषटकम्: खुद की पहचान कराने वाला छह श्लोकों का स्तोत्र, जानिए कब करें पठन
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

भारतीय अध्यात्म परंपरा में 'मैं कौन हूं?' का सवाल बेहद बुनियादी माना जाता है। उपनिषदों और अद्वैत वेदांत की सीख है कि सारी पहचानों के पार हमारा एक शुद्ध, चैतन्यमय और अविनाशी स्वरूप है। इस आत्मस्वरूप का बोध कराने वाला एक असरदार स्तोत्र है 'निर्वाणषटकम्'। इसके हर चरण का अंत एक गहरी अनुभूति के साथ होता है।

'चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।'

यानी 'मैं चैतन्य और आनंद के स्वरूप वाला शिव हूं; मैं शिव हूं।'

माना जाता है कि यह स्तोत्र आद्य शंकराचार्य ने रचा। 'निर्वाणषटकम्' का मतलब है छह श्लोकों का स्तोत्र। इन छह श्लोकों के जरिए साधक को बाहरी पहचानों से भीतर की तरफ ले जाया जाता है और आखिर में उसके शुद्ध आत्मस्वरूप के बोध का रास्ता दिखाया गया है।

'शिव' शब्द सिर्फ भगवान शंकर के सगुण रूप तक सीमित नहीं है। इसका व्यापक आध्यात्मिक अर्थ कल्याणस्वरूप, मंगलमय और शुद्ध चैतन्य भी है। इसलिए 'शिवोऽहम्' को अहंकार से 'मैं भगवान शंकर ही हूं' के मतलब में नहीं लेना है। अद्वैत वेदांत के संदर्भ में इसका अर्थ है कि मेरा असली आत्मस्वरूप शुद्ध चैतन्य है और उस चैतन्य के परमस्वरूप की ब्रह्म से एकता है। यह अनुभूति शरीर या अहंकार की नहीं, आत्मतत्त्व की है।

स्तोत्र शुरू से ही साधक को भीतर की ओर मोड़ता है। 'मनोबुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं' यानी मैं मन नहीं, बुद्धि नहीं, अहंकार नहीं और चित्त भी नहीं। मन में विचार आते-जाते हैं, बुद्धि फैसला लेती है, अहंकार 'मैं' और 'मेरा' का भाव बनाता है और चित्त में स्मृतियां और संस्कार जमा रहते हैं। इन सबका अनुभव करने वाला चैतन्य इनसे अलग है, यही इस श्लोक की दिशा है।

इसी तरह 'न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे' यानी मैं कान, जीभ, नाक या आंखें भी नहीं हूं। यहां शंकराचार्य शरीर का अपमान नहीं करते, बल्कि शरीर और आत्मा का फर्क समझाते हैं। शरीर एक साधन है, पर आत्मस्वरूप शरीर तक सीमित नहीं है।

निर्वाणषटकम् पढ़ने के लिए कोई एक ही समय जरूरी होने की बात किसी सर्वमान्य शास्त्रीय कथन में नहीं है। फिर भी शांत, साफ और एकाग्र मन से पठन ज्यादा फायदेमंद माना गया है। सुबह यानी ब्रह्ममुहूर्त या तड़के का वक्त साधना के लिए खास अनुकूल माना जाता है, क्योंकि माहौल शांत होता है और मन पर दिनभर के कामकाज का बोझ नहीं होता। स्नान, देवपूजा या ध्यान से पहले इसे शांति से पढ़ा जा सकता है।

भगवान शिव की पूजा, अभिषेक या शिवनाम स्मरण के बाद निर्वाणषटकम् पढ़ने से उपासना को आत्मचिंतन का साथ मिलता है। शाम को दिनभर की भागदौड़ खत्म होने के बाद कुछ मिनट शांत बैठकर इसे पढ़ना भी अच्छा है। मन का तनाव, बेचैनी और विचारों की भीड़ कम करने के लिए इसे ध्यान के साथ पढ़ा जा सकता है।

ध्यान से पहले यह स्तोत्र खास मायने रखता है। हर श्लोक से 'मैं शरीर नहीं, मैं मन नहीं, मैं अहंकार नहीं' की अंतर्मुखता बनती जाती है। स्तोत्र पूरा होने पर कुछ मिनट शांत बैठकर सिर्फ सांस पर ध्यान दिया जा सकता है और 'शिवोऽहम्' के भाव में टिकने की कोशिश की जा सकती है।

शिवभक्त सोमवार, प्रदोषकाल, श्रावण के सोमवार और महाशिवरात्रि जैसे शिवोपासना के खास मौकों पर इसका पठन कर सकते हैं। पर इसे सिर्फ खास दिनों तक सीमित न रखकर नियमित आत्मचिंतन का हिस्सा बनाना ज्यादा अहम है। पढ़ते समय तेजी से रटने के बजाय हर पंक्ति का अर्थ मन में रखकर पढ़ना ज्यादा फलदायी माना गया है।

परंपरा के मुताबिक निर्वाणषटकम् आद्य शंकराचार्य का स्तोत्र है और उनके जीवनकाल में रचा गया माना जाता है, लेकिन इसकी सटीक तारीख या साल पक्के तौर पर उपलब्ध नहीं है। एक मशहूर परंपरागत कथा सुनाई जाती है। शंकराचार्य अपने गुरु की खोज में थे, तब उनकी मुलाकात गोविंद भगवत्पाद से हुई। उन्होंने शंकर से पूछा, 'तू कौन है?' इस सवाल के जवाब में शंकराचार्य ने आत्मस्वरूप का वर्णन करने वाले छह श्लोक बोले, ऐसी कथा कही जाती है। यही आगे चलकर 'निर्वाणषटकम्' के नाम से मशहूर हुए।

न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ
मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥

यानी मैं चैतन्यस्वरूप हूं, मैं आनंदस्वरूप हूं। मेरा असली स्वरूप शिवस्वरूप है, शिवोऽहम्, शिवोऽहम्!

क्या हम इस विज़िट को गिन लें? PT24 गूगल एनालिटिक्स से देखता है कि कौन सी खबरें किस पर पढ़ी जाती हैं। आपके हां कहने तक यह बंद है, आप सोच रहे हैं तब तक कुछ नहीं गिना जाता, और आप You पर कभी भी अपना मन बदल सकते हैं। हम क्या लेंगे