नागपुर में तान्हा पोला पर बच्चों ने सजाए लकड़ी के नंदी, घर-घर पूजा में मिले पैसे और चॉकलेट
नागपुर के तान्हा पोला पर्व में बच्चे लकड़ी के नंदी सजाकर घर-घर लेकर जाते हैं, जहां पूजा के बदले उन्हें पैसे, चॉकलेट और मिठाई मिलती है।
नागपुर का तान्हा पोला सिर्फ बच्चों का त्योहार भर नहीं है। लकड़ी के नंदी बैल, गली-गली घूमती बच्चों की टोलियां और घर-घर से मिलने वाले पैसे-चॉकलेट, इन सबको मिलाकर यह परंपरा बचपन की एक अलग ही तस्वीर बनाती है। पोला के दिन बच्चे अपने-अपने नंदी को सजाकर पड़ोस के घरों में ले जाते हैं, वहां पूजा करवाते हैं और बदले में उन्हें पैसे, चॉकलेट या मिठाई मिलती है। आज के मॉडर्न जमाने में भी यह परंपरा नागपुर की पहचान बनी हुई है।
पोला के दिन नागपुर की किसी भी गली में अचानक बच्चों की टोलियां दिखने लगती हैं। हाथों में रंग-बिरंगे लकड़ी के नंदी होते हैं और हर चेहरे पर उत्साह साफ नजर आता है। समझ लीजिए, तान्हा पोला आ गया है। इस दिन बच्चों के लिए एक छोटा सा लकड़ी का नंदी किसी महंगे खिलौने से कम नहीं होता। उसे सजाने से लेकर घर-घर ले जाने तक, हर रस्म बच्चे पूरे जोश के साथ निभाते हैं।
तैयारी तान्हा पोला से पहले ही शुरू हो जाती है। लकड़ी के नंदी को रंगा जाता है, उसके सींगों पर सजावट होती है और फूलों, कपड़ों या रंगीन सामान से उसे और आकर्षक बनाया जाता है। नंदी जितना सुंदर दिखे, बच्चों का उत्साह उतना ही बढ़ जाता है। इसके बाद वह पल आता है जिसका बच्चों को बेसब्री से इंतजार रहता है, अपने सजे हुए नंदी को लेकर घर से निकलना।
इस त्योहार की सबसे खास बात है नंदी को लेकर घर-घर जाना। बच्चों की टोलियां अपने लकड़ी के नंदी के साथ पड़ोस के घरों में पहुंचती हैं, वहां नंदी की पूजा की जाती है, घर के बड़े बच्चों को आशीर्वाद देते हैं और खुशी-खुशी उन्हें पैसे, चॉकलेट या मिठाई देते हैं। किसी बच्चे के लिए हाथ में आया सिक्का खुशी की वजह बनता है तो किसी के चेहरे पर चॉकलेट देखकर मुस्कान आ जाती है। कई बार बच्चों की असली खुशी इस बात में होती है कि उनके नंदी की तारीफ कितनी हुई।
महाराष्ट्र में मनाए जाने वाले पोला पर्व में किसान अपने बैलों को नहलाकर सजाते हैं और उनकी पूजा करते हैं। खेती में बैलों के योगदान के प्रति सम्मान जताने वाला यह पर्व कृषि संस्कृति का अहम हिस्सा है। तान्हा पोला इसी परंपरा को बच्चों की दुनिया में लेकर आता है। असली बैलों की जगह यहां लकड़ी के नंदी होते हैं, लेकिन भावना वही रहती है, अपने नंदी को सजाना, उसकी पूजा करवाना और उसे सम्मान देना।
आज बच्चों की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है। मोबाइल, वीडियो गेम और डिजिटल खिलौनों के बीच लकड़ी का एक साधारण नंदी शायद छोटा खिलौना लगे, लेकिन तान्हा पोला के दिन इसकी अहमियत बदल जाती है। बच्चे उसे सिर्फ खिलौने की तरह नहीं देखते, उसके साथ जुड़ी होती है घर से निकलने की खुशी, दोस्तों के साथ घूमने का उत्साह और हर घर से मिलने वाले प्यार की उम्मीद। यही वजह है कि आधुनिकता के बावजूद तान्हा पोला की चमक कम नहीं हुई है।
यहां परंपरा किसी किताब में नहीं पढ़ाई जाती, बच्चे उसे खेलते-खेलते जीते हैं। लकड़ी का नंदी उनके हाथ में होता है, गलियां उनका रास्ता होती हैं और घर-घर मिलने वाला प्यार इस परंपरा की सबसे खूबसूरत सौगात है। समय के साथ खेती बदली, बैलों की जगह मशीनों ने ले ली और बच्चों के खिलौने भी बदल गए, लेकिन नागपुर शहर का तान्हा पोला आज भी उसी मासूमियत के साथ कहता है, "परंपरा पुरानी हो सकती है, लेकिन बचपन के उत्साह के साथ वह कभी पुरानी नहीं होती।"