नागपुर में राशन ट्रकों का GPRS और ऑनलाइन बिल्टी दो महीने से बंद, हाथ से बन रही पर्चियां
एफसीआई से राशन दुकानों तक अनाज पहुंचाने की ऑनलाइन निगरानी अगस्त की शुरुआत से ठप है। विभाग पर कंपनी का करीब 1 करोड़ 40 लाख रुपए का संभावित बकाया बताया जा रहा है।
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नागपुर जिले में गरीबों को मिलने वाले राशन की हर बोरी पर नजर रखने के लिए सरकार ने जो सिस्टम ऑनलाइन किया था, वह अब कागजों पर चल रहा है। एफसीआई से अनाज लेकर निकलने वाले ट्रकों का जीपीआरएस बंद पड़ा है। राशन दुकानदारों को भेजे जाने वाले अनाज की ऑनलाइन बिल्टी भी नहीं बन रही है।
यह ऑनलाइन व्यवस्था इसलिए लागू की गई थी कि सरकारी राशन की सप्लाई में पारदर्शिता रहे और एफसीआई से राशन दुकानों तक जाने वाली हर खेप पर नजर रखी जा सके। विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक यह सेवा अगस्त की शुरुआत से बंद है, यानी पिछले 2 महीनों से।
इस सिस्टम का मकसद था कि अनाज की खेप का रास्ता ऑनलाइन रिकॉर्ड में साफ दिखे। अब सिस्टम बंद होने से सरकारी राशन की आवाजाही फिर कागजों में सिमट गई है। अगस्त से अनाज की सप्लाई का ऑनलाइन रिकॉर्ड अपडेट नहीं हो पा रहा। फिलहाल जोनल स्तर पर अधिकारी अपने स्तर से अनाज की मांग कर रहे हैं और सप्लाई के लिए हाथ से बिल्टियां बनाई जा रही हैं।
विभागीय सूत्रों के अनुसार ऑनलाइन व्यवस्था का रखरखाव करने वाली कंपनी का विभाग पर करीब 1 करोड़ 40 लाख रुपए का संभावित बकाया बताया जा रहा है। इसी बकाये की वजह से सेवा बंद होने की बात सामने आई है। इसकी आड़ में पिछले 2 महीने से पूरा काम कागजों पर चल रहा है और इसमें बड़ी धांधली की चर्चा है।
नागपुर जिले की सप्लाई व्यवस्था में जीपीआरएस का काम यह पता लगाना है कि एफसीआई से अनाज लेकर निकला ट्रक कहां पहुंचा, किस समय पहुंचा और तय राशन दुकान तक ही गया या नहीं। ऑनलाइन रिकॉर्ड होने से किसी भी खेप की जानकारी बाद में भी जांची जा सकती थी। लेकिन पिछले 2 महीनों से यह व्यवस्था बंद है, इसलिए ट्रकों की डिजिटल निगरानी और सप्लाई रिकॉर्ड का ऑनलाइन मिलना, दोनों प्रभावित हुए हैं।
सवाल यह उठता है कि जब ट्रक का जीपीआरएस बंद है और ऑनलाइन सप्लाई रिकॉर्ड भी अपडेट नहीं हो रहा, तो सरकारी अनाज की हर खेप की निगरानी किस आधार पर हो रही है।
अन्न धान्य वितरण अधिकारी (शहर) शालिनी गेडाम से कई बार संपर्क करने की कोशिश की गई। बार-बार कॉल करने पर भी उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया और इस मामले पर चुप्पी साधे रहीं। इससे विभाग की उदासीनता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
मिली जानकारी के अनुसार अभी जोनल दफ्तरों से अनाज की मांग की जा रही है और इसके लिए हाथ से बिल्टी तैयार हो रही है। सबसे अहम बात यह है कि ऑफलाइन बिल्टी व्यवस्था शुरू करने का कोई साफ आधिकारिक आदेश होने की जानकारी सामने नहीं आई है। फिर भी जोनल स्तर पर कागजी बिल्टियों से अनाज की सप्लाई हो रही है। यह भी कहा जा रहा है कि कागजी कार्रवाई में ही शासन से अतिरिक्त अनाज की मांग करके पूरा खेल पिछले 2 महीने से चल रहा है।
इस मामले में बड़ी धांधली के संकेत हैं। इसलिए जांच का विषय यह है कि हाथ से बन रही बिल्टियों का रिकॉर्ड किस केंद्रीय व्यवस्था में दर्ज हो रहा है और बाद में भारतीय खाद्य निगम के उठाव रिकॉर्ड तथा राशन दुकानों के स्टॉक से उसका मिलान कैसे होगा।
सरकारी अनाज की सप्लाई में रिकॉर्ड का महत्व सिर्फ कागजी खानापूर्ति तक सीमित नहीं है। इसी रिकॉर्ड से पक्का होता है कि एफसीआई से निकला अनाज तय राशन दुकान तक पहुंचा और वहां से पात्र लाभार्थियों को बांटा गया।