मीरा-भाईंदर की पालिका स्कूलों में चार महीने बाद भी बच्चों को पानी की बोतल नहीं मिली
यूनिफॉर्म और किताबों के बाद अब पानी की बोतलों के बंटवारे में भी देरी, MBMC स्कूलों के बच्चे परेशान
मीरा-भाईंदर महानगरपालिका के स्कूलों में नया शैक्षणिक साल शुरू हुए चार महीने बीत चुके हैं, लेकिन बच्चों को अभी तक पानी की बोतलें नहीं मिली हैं। जिन बच्चों के पास अपनी बोतल नहीं है, उन्हें प्यास लगने पर टीचर से इजाजत लेकर क्लास के बाहर जाकर पानी पीना पड़ रहा है। सबसे हैरानी की बात यह है कि स्टील की बोतलें सप्लाई करने के लिए अप्रैल महीने में ही एक प्राइवेट कंपनी को कॉन्ट्रैक्ट दे दिया गया था, और हर बोतल का रेट करीब 210 रुपये तय भी हो चुका था। इसके बावजूद असली सप्लाई अटकी पड़ी है, जिससे पालिका प्रशासन के प्लानिंग पर सवाल उठ रहे हैं।
मीरा-भाईंदर पालिका के हिंदी, उर्दू, मराठी और गुजराती मीडियम के मिलाकर कुल 36 स्कूल हैं, जिनमें आठ हजार से ज्यादा बच्चे पढ़ते हैं। इनमें ज्यादातर बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर और जरूरतमंद परिवारों से आते हैं, इसलिए पालिका हर साल इन्हें यूनिफॉर्म, जूते, किताबें-कॉपियां और बाकी पढ़ाई का सामान मुफ्त देती है। यह सामान साल की शुरुआत में या कम से कम पहले हफ्ते में मिल जाना चाहिए, लेकिन पिछले कुछ सालों से पैरेंट्स इसमें देरी की शिकायत करते आ रहे हैं।
इस बार भी यूनिफॉर्म, किताबों-कॉपियों और बाकी सामान के बंटवारे में देरी पहले ही सामने आ चुकी थी, अब उसमें पानी की बोतलों का मामला भी जुड़ गया है। कुछ बच्चे घर से पुरानी प्लास्टिक की बोतलों या कोल्ड ड्रिंक की बोतलों में पानी भरकर स्कूल ला रहे हैं। जिनके पास बोतल नहीं है, उन्हें क्लास चलते हुए भी पानी पीने के लिए बाहर जाना पड़ता है। बच्चों का कहना है कि खासकर मिड-डे मील के बाद पानी की जगह पर बच्चों की बहुत भीड़ लग जाती है।
अप्रैल में ही स्टील की बोतलों के लिए कॉन्ट्रैक्ट की पूरी प्रक्रिया हो चुकी थी और एक बोतल का रेट करीब 210 रुपये तय हुआ था। स्कूल शुरू होने से पहले ही सामान उपलब्ध कराने के निर्देश थे, फिर भी सितंबर आ गया और बोतलें अभी तक नहीं बंटी हैं। इसलिए पैरेंट्स पूछ रहे हैं कि कॉन्ट्रैक्ट देने के बाद असली सप्लाई और बंटवारे में देरी आखिर कहां हुई।
पालिका बच्चों को पढ़ाई के सामान के साथ जूते भी देती है। पहले लड़कों और लड़कियों को उनकी जरूरत के हिसाब से अलग-अलग डिजाइन के जूते मिलते थे, लेकिन इस बार आरोप है कि लड़कों वाले जूते ही लड़कियों को भी दे दिए गए। इससे सवाल उठ रहा है कि बच्चों की जरूरत और इस्तेमाल का ख्याल रखे बिना ही सामान बांटा जा रहा है। यह भी चर्चा है कि पढ़ाई का सामान सप्लाई करने वाली एक ही कंपनी को कई सालों से कॉन्ट्रैक्ट मिलता आ रहा है। इसी वजह से पैरेंट्स मांग कर रहे हैं कि पालिका कॉन्ट्रैक्ट की प्रक्रिया, सामान की क्वालिटी, सप्लाई का टाइम और बंटवारे की गहराई से जांच करे।
सामान बांटने में हर साल होने वाली देरी को देखते हुए पालिका ने कुछ समय के लिए सामान की जगह सीधे बच्चों के बैंक अकाउंट में पैसे जमा करने का फैसला लिया था। लेकिन बीजेपी की सत्ता आने के बाद यह फैसला रद्द कर दिया गया और फिर से पालिका के जरिए ही पढ़ाई का सामान देने का फैसला हुआ। अब फिर से सामान बांटने में देरी हो रही है, जिससे इस फैसले को लागू करने के तरीके पर भी सवाल उठ रहे हैं।
पालिका कमिश्नर राधाबिनोद शर्मा ने स्कूल शुरू होने से पहले ही यूनिफॉर्म और बाकी पढ़ाई का सामान उपलब्ध कराने के आदेश दिए थे। लेकिन असल में सामान बांटने में देरी होने से प्रशासन की प्लानिंग की कमी सामने आ रही है, ऐसी शिकायत पैरेंट्स कर रहे हैं। पानी की बोतल बच्चों की रोजाना की जरूरत की चीज है, फिर भी इसके लिए चार महीने इंतजार करना पड़ना गंभीर बात है, ऐसा पैरेंट्स का कहना है। बोतलों की सप्लाई कहां अटकी, कॉन्ट्रैक्टर ने समय पर सामान दिया या नहीं, देरी के लिए जिम्मेदार कौन है और पालिका प्रशासन संबंधित कॉन्ट्रैक्टर पर कार्रवाई करेगा या नहीं, ऐसे सवाल पैरेंट्स पूछ रहे हैं। इस बारे में पालिका की डिप्टी कमिश्नर कविता बोरकर से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला।