महाराष्ट्र में 33 साल बाद फिर होंगे कॉलेज छात्र चुनाव, सरकार ने बनाई समिति
पूर्व कुलगुरु सुहास पेडणेकर की अध्यक्षता में 12 सदस्यों की समिति नियम तय करेगी
महाराष्ट्र में यूनिवर्सिटी और उनसे जुड़े कॉलेजों में स्टूडेंट काउंसिल के चुनाव को लेकर राज्य सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। पिछले 33 सालों से जो चुनाव कभी हुए ही नहीं, उन्हें अब दोबारा शुरू करने की कवायद शुरू हो गई है। इसके लिए सरकार एक 12 सदस्यों की समिति बनाने जा रही है जो पूरा ढांचा और नियमावली तैयार करेगी।
इस समिति की अध्यक्षता मुंबई यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलगुरु प्रोफेसर सुहास पेडणेकर करेंगे। समिति में मुंबई यूनिवर्सिटी के कुलसचिव डॉ. प्रसाद कारंडे को भी शामिल किया गया है।
समिति अलग-अलग पक्षों से बातचीत कर यह सुझाव देगी कि छात्र चुनाव शांतिपूर्ण, पारदर्शक, सबको साथ लेकर चलने वाले और छात्रों पर केंद्रित तरीके से कैसे कराए जाएं। चुनाव में बाहरी राजनीतिक दखल और कमर्शियलाइजेशन रोकने के उपायों पर भी स्टडी होगी। इसके अलावा स्टूडेंट काउंसिल के फंड मैनेजमेंट, बजट, खर्च और ऑडिट के लिए गाइडलाइंस बनाने की जिम्मेदारी भी इसी समिति पर है। चुने गए छात्र प्रतिनिधियों के लिए ओरिएंटेशन और ट्रेनिंग प्रोग्राम, साथ ही नामांकन फॉर्म, छानबीन और शिकायत निवारण के लिए डिजिटल या ऑनलाइन सिस्टम के इस्तेमाल पर भी विचार किया जाएगा।
समिति यह भी देखेगी कि स्टूडेंट काउंसिल में महिलाओं, अनुसूचित जाति-जनजाति और बाकी आरक्षित व वंचित तबकों के छात्रों को सही प्रतिनिधित्व कैसे मिले। साथ ही राष्ट्रीय सेवा योजना यानी एनएसएस, राष्ट्रीय छात्र सेना यानी एनसीसी, स्पोर्ट्स और कल्चरल एक्टिविटीज में हिस्सा लेने वाले स्टूडेंट्स के प्रतिनिधित्व पर भी सिफारिशें दी जाएंगी।
1980 और 1990 के दशक में महाराष्ट्र के यूनिवर्सिटी और कॉलेज कैंपस में राजनीतिक दखल, हिंसा और क्राइम का साया काफी बढ़ गया था। 1989 से 1990 के बीच स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन के चुनावों में राजनीतिक पार्टियों की सीधी दखलंदाजी बढ़ी। दबदबे की इस लड़ाई में कॉलेजों में मारपीट, धमकियां और हथियारों का इस्तेमाल शुरू हो गया। यह हिंसा मुंबई के एक जाने-माने कॉलेज में अपने चरम पर पहुंची, जहां एक स्टूडेंट की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी।
इस वारदात ने पूरे महाराष्ट्र को हिलाकर रख दिया। लॉ एंड ऑर्डर का गंभीर सवाल खड़ा होने पर उस वक्त की सरकार ने तुरंत कदम उठाते हुए महाराष्ट्र यूनिवर्सिटी एक्ट 1994 के तहत 1994-95 के शैक्षणिक वर्ष से सीधे स्टूडेंट चुनावों पर पूरी तरह बैन लगा दिया था।
कोविड-19 महामारी और उसके बाद के दौर में स्टूडेंट चुनाव का मुद्दा पीछे चला गया था। लेकिन हाल के एजुकेशन से जुड़े आंदोलनों में जेन जेड पीढ़ी के युवाओं की भागीदारी बढ़ने के बाद स्टूडेंट रिप्रेजेंटेशन और कैंपस चुनावों का मुद्दा फिर चर्चा में आ गया है।
अब राज्य सरकार की बनाई इस 12 सदस्यीय समिति के सामने दो बड़ी चुनौतियां हैं, पहली, स्टूडेंट चुनाव कराने में पहले आई दिक्कतों को समझकर उनका हल निकालना, और दूसरी, बाहरी राजनीतिक दखल और कमर्शियलाइजेशन पर लगाम कसते हुए छात्रों के अपना प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया तय करना। समिति की रिपोर्ट आने के बाद स्टूडेंट चुनावों को लेकर आगे की प्रक्रिया पर सरकार फैसला लेगी।