कोल्हापुर में दस साल की सबसे कम बारिश, सालाना औसत का सिर्फ 51 फीसदी पानी गिरा
जून से सितंबर के बीच कोल्हापुर जिले में सिर्फ 899 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई, जो पिछले दस साल में सबसे कम है।
कोल्हापुर जिले के लिए इस साल की बारिश चिंता बढ़ाने वाली साबित हो रही है। पिछले दस साल में इतनी कम बारिश कभी दर्ज नहीं हुई। जून से सितंबर, यानी चार महीनों में जिले में सिर्फ 899 मिलीमीटर पानी गिरा। यह सालाना औसत का महज 51 फीसदी है। जिले का सालाना औसत पर्जन्यमान 1 हजार 733 मिलीमीटर है।
इस मानसून में शुरू से ही बारिश ने साथ नहीं दिया। पूरा जून सूखा निकल गया, जिससे खरीफ सीजन की शुरुआत में ही किसानों की फिक्र बढ़ गई थी। बीच में कुछ वक्त बारिश ने राहत दी, लेकिन सितंबर में वह फिर गायब हो गई। इसी वजह से चार महीने के मानसून सीजन का औसत काफी नीचे चला गया।
सितंबर में आम तौर पर 17 दिन बारिश होती है, मगर इस बार पूरे जिले में सिर्फ चार दिन पानी गिरा। अगस्त और सितंबर कोल्हापुर जिले के लिए बारिश के अहम महीने माने जाते हैं। इस बार बारिश के दिन भी कम रहे और कुल मात्रा भी कम रही। इसका सीधा असर खेती, पानी के भंडार और आने वाली गर्मी की तैयारी पर पड़ने की आशंका है। कुछ जगहों पर धान और सोयाबीन की कटाई के सीजन में बारिश हुई, जिससे कटाई में रुकावट आई।
कुछ इलाकों में बारिश जरूर हुई, लेकिन वह न हर जगह हुई और न लगातार हुई। यानी जहां पड़ी, जितनी पड़ी, उतनी ही। साल 2026 की बारिश पिछले दशक में सबसे कम साबित होती है। साल 2023 में 971 मिलीमीटर पानी गिरा था। इस बार आंकड़ा उससे भी नीचे, 899 मिलीमीटर पर रुक गया।
यह आंकड़ा सिर्फ मौसम के बदलाव की नोंद भर नहीं है। जिले के आगे के पानी के नियोजन के लिए यह एक इशारा भी है। लौटती बारिश ठीक रही तो हालात में कुछ सुधार हो सकता है। लेकिन बारिश ने फिर हाथ खींचा तो उसका असर रबी सीजन से लेकर अगली गर्मी तक महसूस हो सकता है।
कोल्हापुर जिले में खरीफ की फसलों, यानी धान, सोयाबीन, मूंगफली और दूसरी फसलों के लिए बारिश का लगातार होना जरूरी है। इस बार लंबे खंड की वजह से कुछ इलाकों में फसलों की बढ़वार पर असर पड़ा है। अब लौटती बारिश कितनी और कब होती है, उसी पर आगे की स्थिति काफी हद तक निर्भर करेगी।
लौटती बारिश उम्मीद के मुताबिक नहीं हुई तो असर सिर्फ खरीफ फसलों तक सीमित नहीं रहेगा। रबी की बुवाई, जमीन की नमी, कुओं का जलस्तर और गर्मी में पानी की उपलब्धता पर भी इसका असर पड़ सकता है। इस मानसून में पश्चिम महाराष्ट्र की बारिश में भी बड़ा फर्क दिखा है। एक तरफ पुणे और सातारा जिलों में औसत से ज्यादा बारिश हुई, तो दूसरी तरफ कोल्हापुर, सांगली और सोलापुर जिलों में भारी कमी रही।