कोकण के गणपति उत्सव में माटवी पर 'कवंडळ' बांधने की खास परंपरा, जानिए इसके पीछे की वजह
कोकण में गणपति के माटवी में रानफल, बेलें और पत्ते बांधने की पुरानी परंपरा है, उसमें कवंडळ नाम के रानफल को खास जगह दी जाती है।
गणेशोत्सव कहते ही आंखों के सामने आती है गणपति की सुंदर मूर्ति, दूर्वा, लाल फूल, मोदक और भक्ति का माहौल। लेकिन कोंकण के पारंपरिक गणेशोत्सव की मजा इससे थोड़ी अलग है। यहां गणपति के चारों तरफ सजाई जाने वाली माटवी या माटोळी सिर्फ डेकोरेशन नहीं है, बल्कि प्रकृति, खेती, गांव की रोजमर्रा की जिंदगी और श्रद्धा का एक साथ मिला हुआ संगम माना जाता है।
इस माटवी में अलग अलग जंगली फल, फूल, पत्ते, बेलें और वनस्पतियों के गुच्छे बांधे जाते हैं। इनमें से ही एक खास जंगली फल है कवंडळ या कौंडाळ। गणपति के आसन पर या मूर्ति के ठीक ऊपर यह बंधा हुआ दिखता है, और फिर सहज सवाल उठता है कि गणराय के ऊपर कवंडळ ही क्यों बांधते हैं? इसका जवाब सिर्फ एक धार्मिक वजह में छुपा नहीं है, बल्कि कोंकण की प्रकृति और वहां के लोकजीवन से जुड़ी कई बातों में है।
माटवी यानी गणपति की मूर्ति के चारों तरफ या ऊपर खड़ा किया जाने वाला पत्तों फूलों और जंगली फलों का मंडप। कोंकण के कई घरों में गणपति बिठाने के बाद माटवी सजाने की प्रथा आज भी चली आ रही है। पहले बाजार से लाई गई सजावट की चीजों के बजाय गांव के आसपास के जंगल से, खेत से या माळरान से मिलने वाली वनस्पतियों को इस सजावट में ज्यादा अहमियत मिलती थी। इसलिए माटवी मानो बारिश के मौसम में खिली पूरी प्रकृति की गणराय को दी गई भेंट बन जाती है। श्रावण-भाद्रपद में बारिश की वजह से कोंकण हरा भरा हो जाता है, पेड़ों को नई पालवी फूटती है, बेलें खिली होती हैं और जंगली फल लदे होते हैं। इसी दौर की प्रकृति की यह देन गणराय के चरणों में चढ़ाने के पीछे प्रकृति के प्रति कृतज्ञता दिखती है।
कवंडळ स्थानीय इलाके में पाई जाने वाली जंगली बेल है और अपने खास फलों की वजह से यह माटवी में फौरन नजर आ जाती है। कुछ जगहों पर इसे अलग स्थानीय नाम से भी जाना जाता है। कवंडळ के गुच्छे माटवी में बांधे जाने पर गणपति के आसन के चारों तरफ प्रकृति की सुंदर सजावट तैयार हो जाती है। लेकिन यह सजावट सिर्फ सुंदर दिखने के लिए नहीं है, बल्कि जंगल से मिलने वाली हर चीज को भगवान को नैवेद्य के तौर पर अर्पित करने की पुरानी परंपरा का यह प्रतीक है। गणपति को बुद्धि, मंगलता और समृद्धि का देवता माना जाता है, इसलिए प्रकृति ने दिए फल, फूल, पत्ते और अनाज याद करके उनकी पूजा करने में 'प्रकृति ने जो दिया, वो पहले भगवान को' ऐसा भाव दिखता है।
लोकमान्यता के मुताबिक गणपति की मां पार्वती को आदिशक्ति का रूप माना जाता है। भारतीय परंपरा में पृथ्वी, प्रकृति और मातृशक्ति को एक दूसरे से जोड़कर देखा जाता है। इसलिए गणराय को हरी भरी वनस्पतियों से घेरना यानी उन्हें प्रकृति की गोद में बिठाना, ऐसी भावुक कल्पना इस परंपरा में दिखती है। शिव-पार्वती के पुत्र गणपति के मामले में शिव यानी चैतन्य और पार्वती यानी प्रकृति ऐसी बात कही जाती है।
पहले के लोगों की जिंदगी प्रकृति के बहुत करीब थी। जंगल की कई वनस्पतियों का इस्तेमाल खाने, दवा, घरेलू उपाय और धार्मिक विधियों में किया जाता था। माटवी में अलग अलग जंगली वनस्पतियां बांधने के पीछे यह पुराना ज्ञान भी एक वजह हो सकता है। इससे कवंडळ जैसी जंगली वनस्पतियां अगली पीढ़ी को मालूम हों और गांव वालों का जंगल से रिश्ता बना रहे, यह भी एक मकसद होगा।
माटवी में फलों से लदी बेलें और जंगली फल बांधने के पीछे समृद्धि की भावना भी है। फल यानी कमाई, बीज यानी आगे की जिंदगी और हरे पत्ते यानी विकास और चैतन्य, ऐसी कल्पना लोकपरंपरा में दिखती है। गणपति बिठाने से पहले माटवी के लिए चाहिए वनस्पतियां जुटाने की हलचल शुरू हो जाती है और घर के बड़े बुजुर्ग कौन से पत्ते लेने हैं, कौन से फल बांधने हैं यह सिखाते हैं। इस तरह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थानीय वनस्पतियों की पहचान और परंपरा पहुंचती रहती है।