मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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20:00 IST

कागल से पुणे हाइवे पर टोल वसूली तो है, आग बुझाने का अलग इंतजाम नहीं

कागल-शेंद्रे-पुणे नेशनल हाइवे पर पांच टोल प्लाजा होने के बावजूद गाड़ी में आग लगने पर मदद के लिए लोकल फायर ब्रिगेड और शुगर फैक्ट्रियों के भरोसे रहना पड़ता है। हर 35 किलोमीटर पर NHAI का अपना फायर फाइटर सेंटर बनाने की मांग उठी है।

कागल से पुणे हाइवे पर टोल वसूली तो है, आग बुझाने का अलग इंतजाम नहीं
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

महाराष्ट्र में कागल से शेंद्रे होते हुए पुणे तक जाने वाला नेशनल हाइवे सबसे व्यस्त और अहम रास्तों में गिना जाता है। इस पूरे रूट पर पांच टोल नाके हैं - कागल, किणी, तासवडे, आणेवाडी और खेड-शिवापूर। हर टोल नाके पर एंबुलेंस और क्रेन जैसी सुविधाएं तो मौजूद हैं, लेकिन अगर एक्सीडेंट के बाद किसी गाड़ी में आग लग जाए तो उसे तुरंत बुझाने के लिए नेशनल हाइवे अथॉरिटी की टोल सिस्टम के पास अपनी अलग फायर फायटिंग व्यवस्था नहीं है। ऐसे में मलकापूर, कराड और सातारा नगर पालिका के साथ-साथ अजिंक्यतारा, कृष्णा और सह्याद्री शुगर फैक्ट्रियों के फायर ब्रिगेड पर निर्भर रहना पड़ता है। हाइवे पर बढ़ते ट्रैफिक को देखते हुए अब यह सिस्टम बदलने की जरूरत महसूस की जा रही है।

आज की गाड़ियों में पहले के मुकाबले काफी एडवांस इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, सेंसर, कंप्यूटराइज्ड मैकेनिज्म, वायरिंग, बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम और तमाम इलेक्ट्रिकल पार्ट्स इस्तेमाल होते हैं। इससे गाड़ियों की परफॉर्मेंस, सेफ्टी और सुविधा तो बढ़ी है, लेकिन अगर इलेक्ट्रिकल सिस्टम में गड़बड़ी हो जाए तो आग लगने का खतरा भी बना रहता है। कई बार वायरिंग में शॉर्ट सर्किट, बैटरी या इलेक्ट्रिकल पार्ट्स में खराबी, एक्सीडेंट में वायरिंग डैमेज होने या फ्यूल लीक होने से आग लगने के मामले सामने आते रहते हैं।

हाइवे पर तेज रफ्तार से दौड़ती गाड़ियों का एक्सीडेंट होने के बाद अगर कुछ ही पलों में आग लग जाए, तो हालात बेहद गंभीर हो सकते हैं। अगर ड्राइवर और पैसेंजर गाड़ी में फंसे हों तो उन्हें बाहर निकालने के लिए मिलने वाला वक्त सिर्फ कुछ मिनटों का होता है। आजकल की गाड़ियों में इलेक्ट्रॉनिक लॉकिंग और दूसरे ऑटोमैटिक सिस्टम होने की वजह से एक्सीडेंट के बाद पावर सप्लाई कट होने या सिस्टम फेल होने पर दरवाजे खोलने में दिक्कत आ सकती है। कुछ मामलों में गाड़ी के दरवाजे लॉक होने से पैसेंजर तुरंत बाहर नहीं निकल पाए, ऐसा भी देखा गया है। ऐसे में आग फैलने से पहले गाड़ी में मौजूद लोगों को सुरक्षित निकालना बहुत जरूरी हो जाता है।

यही वजह है कि सिर्फ एंबुलेंस और क्रेन काफी नहीं हैं। आग से निपटने और एक्सीडेंट में फंसी गाड़ी से लोगों को बाहर निकालने के लिए अलग फायर फायटर और रेस्क्यू सिस्टम की सख्त जरूरत है। घटनास्थल तक फायर ब्रिगेड की गाड़ी पहुंचने में लगने वाला हर मिनट कीमती होता है। दूर के शहर से फायर ब्रिगेड आने तक अगर आग गाड़ी के केबिन तक पहुंच जाए, तो जान जाने का खतरा काफी बढ़ जाता है।

कागल से पुणे तक पूरे रूट पर पांच टोल नाके होने के बावजूद हर टोल सिस्टम के अपने इलाके में एडवांस फायर फायटिंग और रेस्क्यू टीम तैयार रखनी चाहिए। खासकर हर 35 किलोमीटर पर NHAI के जरिए अलग फायर फायटर सेंटर बनाने की मांग उठनी स्वाभाविक है। इन सेंटरों में एडवांस फायर फायटिंग गाड़ी, फोम टेंडर, पर्याप्त पानी का स्टॉक, हाइड्रॉलिक कटर, दरवाजे और गाड़ी के पार्ट्स काटने के रेस्क्यू औजार, फायर-रेजिस्टेंट सामान और ट्रेंड स्टाफ होना चाहिए। टोल नाके पर लगे सीसीटीवी या कंट्रोल रूम को एक्सीडेंट की जानकारी मिलते ही फायर फायटर टीम मौके के लिए रवाना हो, ऐसा सिस्टम बनाया जा सकता है। एंबुलेंस, क्रेन, पुलिस और फायर ब्रिगेड के बीच तालमेल के लिए अलग इमरजेंसी कंट्रोल सिस्टम भी बनाया जा सकता है। इससे आग बुझाने के साथ-साथ गाड़ी में फंसे लोगों को बाहर निकालकर तुरंत मेडिकल मदद देना भी मुमकिन होगा।

आज इस हाइवे पर हजारों करोड़ रुपये की गाड़ियां दौड़ रही हैं। गाड़ियों की कीमत और टेक्नोलॉजी बढ़ी, रफ्तार भी बढ़ी, लेकिन एक्सीडेंट के बाद तुरंत जान बचाने वाला सिस्टम उसी रफ्तार से मजबूत हुआ है या नहीं, यह सवाल पूछने का वक्त आ गया है। मलकापूर, कराड, सातारा नगर पालिका के साथ अजिंक्यतारा, कृष्णा और सह्याद्री शुगर फैक्ट्रियों के फायर ब्रिगेड ने इमरजेंसी में कई बार मदद की है। लेकिन हाइवे की इमरजेंसी फायर फायटिंग व्यवस्था लोकल संस्थाओं की मदद पर निर्भर रहने के बजाय NHAI के अपने सिस्टम में हो, तो यह ज्यादा असरदार होगा। एंबुलेंस घायलों की जान बचाती है, क्रेन एक्सीडेंट वाली गाड़ी हटाती है, लेकिन जलती हुई गाड़ी से जिंदा लोगों को निकालने में पहले कुछ मिनटों में पहुंचने वाला फायर फायटर ही निर्णायक साबित हो सकता है। इसलिए टोल वसूली के साथ-साथ पैसेंजर्स की जान की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए कागल से पुणे हाइवे पर हर 35 किलोमीटर पर एडवांस फायर फायटिंग और रेस्क्यू सेंटर बनाने का फैसला जल्द लेने की जरूरत है।

नेशनल हाइवे पर छोटे-बड़े एक्सीडेंट लगातार होते रहते हैं। कई बार एक्सीडेंट के बाद गाड़ियों में आग लगने की घटनाएं भी सामने आती हैं। कुछ मामलों में पैसेंजर्स को जान गंवानी पड़ती है, तो कहीं गाड़ियों के साथ लाखों रुपये का सामान जलकर बड़ा आर्थिक नुकसान हो जाता है। इसलिए एक्सीडेंट के बाद तुरंत मौके पर पहुंचने वाला फायर फायटिंग सिस्टम होना बहुत जरूरी है।

कुछ दिन पहले उंब्रज में एक मालवाहक ट्रक से धुआं निकलता देखा गया था। उस वक्त अगर सही समय पर फायर ब्रिगेड की मदद मिल जाती, तो आग को वहीं काबू में लाकर बड़ा आर्थिक नुकसान टाला जा सकता था। हाइवे पर ऐसी घटनाएं होने की आशंका को देखते हुए लोकल फायर ब्रिगेड पर निर्भर रहने के बजाय NHAI की अपनी एडवांस फायर फायटिंग और रेस्क्यू व्यवस्था हाइवे पर काम करती रहे, यह जरूरी है - यह बात मनसे युवा सेना पदाधिकारी, उंब्रज के अमोल कांबळे ने कही।

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