IRDAI का नया प्रस्ताव: कमिशन पर सख्त लिमिट से पॉलिसी सस्ती होने की उम्मीद
बीमा नियामक IRDAI ने कमिशन और खर्च पर नई सीमाएं तय करने वाला कंसल्टेशन पेपर जारी किया, जिससे बाजार में हलचल मच गई है।
भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण यानी IRDAI ने एक बड़ा कंसल्टेशन पेपर जारी किया है, जिसने पूरे इंश्योरेंस मार्केट में हलचल मचा दी है। इसमें कमिशन और खर्च से जुड़े कई अहम बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं, जिनका असर कंपनियों, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और आम ग्राहकों तक पर पड़ने वाला है।
दरअसल 2023 में IRDAI ने बीमा प्रोडक्ट्स पर कमिशन की सीमा हटा दी थी और यह फैसला कंपनियों के अपने खर्च के नियमों यानी EoM पर छोड़ दिया गया था। इसका फायदा उठाकर डिस्ट्रीब्यूटर, बैंक और एजेंट्स को दिए जाने वाले कमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन कॉस्ट में जबरदस्त बढ़ोतरी हो गई। IRDAI की रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ 2024-25 के वित्त वर्ष में लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों ने कमिशन पर 60,800 करोड़ रुपये खर्च कर दिए, जो पिछले साल के मुकाबले 18 फीसदी ज्यादा है। जबकि इसी दौरान बीमा प्रीमियम सिर्फ 6.73 फीसदी ही बढ़ा। यानी कमिशन बढ़ने की रफ्तार कारोबार बढ़ने की रफ्तार से कहीं ज्यादा तेज रही, जिसका सीधा बोझ ग्राहकों की जेब पर पड़ रहा था।
इसी को देखते हुए अब IRDAI कमिशन पर फिर से सख्त हद तय करने जा रहा है। प्रोडक्ट के टाइप, डिस्ट्रीब्यूटर के स्वरूप और किए गए काम के हिसाब से कमिशन की अधिकतम लिमिट तय की जाएगी। लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों को अगले 2 साल में अपना खर्च 15 फीसदी और 5 साल में 12.5 फीसदी तक लाना होगा। वहीं जनरल और हेल्थ इंश्योरेंस में यह खर्च अगले 5 साल में 20 फीसदी तक घटाने का प्रस्ताव है। पूरे डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम को आसान बनाने के लिए तीन कैटेगरी बनाई गई हैं - IDEs यानी बीमा डिस्ट्रीब्यूशन संस्थाएं, IDPs यानी इंडिविजुअल एजेंट या सेलर, और MIIs।
इस प्रस्ताव का सबसे बड़ा झटका पॉलिसीबाजार जैसी कंपनियों को लगा। पॉलिसीबाजार की पैरेंट कंपनी PB Fintech और दूसरी फाइनेंशियल कंपनियों के शेयर सिर्फ दो दिन में करीब 40 फीसदी तक गिर गए, जिससे निवेशकों को 32,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ। ब्रोकरेज हाउस Jefferies समेत कई ग्लोबल फर्मों का अनुमान है कि अगर कमिशन रेट में सिर्फ 10 फीसदी की कटौती भी हुई, तो डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और डिस्ट्रीब्यूटर्स की कमाई में 10 से 12 फीसदी तक गिरावट आ सकती है। इसके अलावा बैंक या NBFC जो लोन के साथ जबरदस्ती बीमा बेचते हैं, उस मॉडल पर भी सख्ती आने वाली है, जिससे इनकी फीस-कमाई को झटका लगेगा।
लेकिन यही प्रस्ताव आम ग्राहकों के लिए बड़ी राहत की बात है। कंपनियों का खर्च कम होने से पॉलिसी के प्रीमियम रेट भी कम हो सकते हैं और सेविंग स्कीम्स पर बेहतर रिटर्न मिल सकता है। अब ग्राहक को यह भी साफ पता चलेगा कि उसके भरे पैसे में से कितना एजेंट या बैंक की जेब में जा रहा है। अगर कोई एजेंट गलत जानकारी देकर या मिस-सेलिंग करके पॉलिसी बेचता है, तो कागजों पर उसकी आईडी दर्ज होगी और फ्रॉड साबित होने पर उसे मिला कमिशन कंपनी को वापस लेना होगा। 'बीमा सुगम' नाम की डिजिटल सुविधा से घर बैठे सभी कंपनियों की पॉलिसी कंपेयर करना, क्लेम लेना और पॉलिसी एक कंपनी से दूसरी कंपनी में ट्रांसफर करना आसान हो जाएगा।
एक और अहम बदलाव यह है कि अब सिर्फ पॉलिसी का प्रीमियम, फीचर्स या परफॉर्मेंस देखने के लिए ग्राहक को अपना नाम, मोबाइल नंबर या ईमेल आईडी देने की जरूरत नहीं पड़ेगी। IRDAI का कहना है कि अक्सर सिर्फ जानकारी दिखाने के बहाने मोबाइल नंबर लिया जाता है और बाद में उसका इस्तेमाल मार्केटिंग या प्रोडक्ट बेचने के लिए किया जाता है, इसे रोकने के लिए यह बदलाव किया जा रहा है।
फिलहाल यह प्रस्ताव 25 अक्टूबर तक पब्लिक फीडबैक और सुझावों के लिए खुला रखा गया है। इससे शेयर बाजार में तुरंत हलचल जरूर मची है, लेकिन लंबे समय में यह नियम भारत के बीमा सेक्टर को ज्यादा पारदर्शी, सुरक्षित और पूरी तरह ग्राहक-केंद्रित बनाने वाला माना जा रहा है।