Internship vs Apprenticeship: पढ़ाई पूरी होने के बाद आगे क्या? जानिए इंटर्नशिप और अप्रेंटिसशिप में असली फर्क
इंटर्नशिप और अप्रेंटिसशिप का मकसद, अवधि और स्टाइपेंड अलग हैं; जानिए आपके लिए कौन सा रास्ता सही है।
पढ़ाई पूरी होने के बाद नौजवानों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि अब आगे क्या करें। किताबों की पढ़ाई से बाहर निकलकर काम की दुनिया में कदम रखना हो तो प्रैक्टिकल अनुभव की जरूरत पड़ती है। यह अनुभव पाने के लिए इंटर्नशिप और अप्रेंटिसशिप, ये दो अच्छे रास्ते हैं।
अक्सर लोगों को ये दोनों विकल्प एक जैसे ही लगते हैं। लेकिन असल में दोनों का मकसद, काम करने का तरीका और उनसे मिलने वाले फायदे बिल्कुल अलग होते हैं। करियर की शुरुआत करते वक्त कई लोग इसी उलझन में रहते हैं। आइए आज दोनों के बीच का फर्क आसान तरीके से समझते हैं।
इंटर्नशिप आमतौर पर कॉर्पोरेट कल्चर, डेस्क जॉब, मीडिया, मार्केटिंग या सॉफ्टवेयर जैसे क्षेत्रों से जुड़ी होती है। इसमें पढ़ाई के दौरान जो थ्योरी सीखी गई है, उसे कॉर्पोरेट में प्रैक्टिकली आजमाना ही मकसद होता है।
अप्रेंटिसशिप का रिश्ता तकनीकी, मैन्युफैक्चरिंग, ट्रेड और स्किल वाले जॉब्स से है। यहां किसी एक खास ट्रेड में पूरी तरह माहिर बनाना मकसद होता है।
अवधि की बात करें तो इंटर्नशिप आमतौर पर छोटी होती है, यानी कुछ हफ्तों से लेकर 6 महीने तक की। इसके उलट अप्रेंटिसशिप 1 से 3 साल या उससे भी ज्यादा लंबी होती है और तय कॉन्ट्रैक्ट पर चलती है।
पैसे के मामले में भी दोनों में फर्क है। इंटर्नशिप में अक्सर कोई पैसा नहीं मिलता या स्टाइपेंड कम मिलता है। वहीं अप्रेंटिसशिप कानूनी तौर पर नियमों से बंधी ट्रेनिंग स्कीम है, जिसमें सरकारी नियमों के हिसाब से तय स्टाइपेंड मिलना जरूरी है।
अब सवाल यह है कि आपके लिए क्या सही है। अगर आप डेस्क जॉब, मैनेजमेंट, क्रिएटिव फील्ड या सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट में जाना चाहते हैं, तो इंटर्नशिप आपके लिए अच्छा विकल्प है।
दूसरी तरफ, अगर आप तकनीकी क्षेत्र (Technical Field), ITI, डिप्लोमा या इंजीनियरिंग बैकग्राउंड से हैं और हुनर सीखकर सीधे पक्की नौकरी या रोजगार पाना चाहते हैं, तो अप्रेंटिसशिप आपके लिए ज्यादा फायदेमंद रहेगी।