इंटरमिटेंट फास्टिंग और दिल की सेहत: रिसर्च में क्या सामने आया
वजन घटाने के लिए अपनाई जा रही इंटरमिटेंट फास्टिंग को लेकर अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन और ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन के हवाले से दिल पर असर की बात सामने आई है।
हर कोई फिट रहना चाहता है और इसके लिए लोग कसरत और अलग-अलग डाइट प्लान अपनाते हैं। वजन घटाने के लिए कई तरह के डाइट प्लान चलन में हैं, जिनमें से एक है इंटरमिटेंट फास्टिंग। पिछले कुछ सालों में लोगों ने शरीर का वजन कम करने के लिए इसे काफी अपनाया है।
इंटरमिटेंट फास्टिंग में 16:8, 5:2 या तय वक्त के अंदर ही खाने के तरीके अपनाए जाते हैं। इसका मकसद शरीर का फालतू वजन घटाना होता है। लेकिन कई अध्ययनों में यह सामने आया है कि यह तरीका दिल की सेहत के लिए फायदेमंद नहीं है। यहां यही समझने की कोशिश है कि इंटरमिटेंट फास्टिंग से दिल और रक्तवाहिनियों की बीमारियां क्यों हो सकती हैं।
अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक 20,000 से ज्यादा बड़ी उम्र के लोगों की रोजमर्रा की दिनचर्या में इंटरमिटेंट फास्टिंग शामिल की गई। इस दौरान 16 घंटे उपवास और 8 घंटे खाने का रूटीन रखा गया। रिपोर्ट के मुताबिक करीब 91 प्रतिशत लोगों में दिल से जुड़ी बीमारियां फैलने लगीं।
ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन के मुताबिक दिल शरीर का बहुत संवेदनशील अंग है। जीवनशैली में कोई भी बदलाव, जैसे खानपान में बदलाव, दिल के काम, ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल के स्तर पर बुरा असर डाल सकता है। इंटरमिटेंट फास्टिंग में पूरा डाइट प्लान बदल जाता है और लोग एक बार में कई घंटे भूखे रहते हैं। इसका असर ब्लड शुगर, स्ट्रेस हार्मोन और चरबी के मेटाबॉलिज्म पर पड़ सकता है, जिससे अलग-अलग शारीरिक दिक्कतें खड़ी हो सकती हैं।
उदाहरण के तौर पर, डायबिटीज का मरीज इंटरमिटेंट फास्टिंग करे तो उसका ब्लड शुगर अचानक कम हो सकता है। स्ट्रेस हार्मोन कॉर्टिसोल का स्तर बढ़ सकता है, जिससे हाई ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ता है। खाने के तरीके में बदलाव से कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड का स्तर भी बदल सकता है। ये तीनों दिक्कतें दिल की बीमारी से जुड़ी हो सकती हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इंटरमिटेंट फास्टिंग हर किसी के लिए वजन घटाने का प्लान नहीं है। इसलिए खास सेहत की समस्या वाले मरीजों को इसे नहीं करना चाहिए। इनमें हार्ट अटैक और पक्षाघात जैसी दिल से जुड़ी बीमारियों के मरीज, दिल की दवाएं लेने वाले मरीज, डायबिटीज के मरीज, हाई ब्लड प्रेशर के मरीज और खाने के विकार वाले लोग गिनाए गए हैं।
इसके अलावा 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को भी, अगर उन्हें ऊपर बताई गई कोई समस्या हो, तो इंटरमिटेंट फास्टिंग की सलाह नहीं दी जाती। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जिन्हें फिर भी करना हो, वे उपवास के घंटे कम रखें, शरीर में पानी की मात्रा बनाए रखें और डाइट में हेल्दी फैट शामिल करें।
एनसीबीआई (NCBI) के मुताबिक इंटरमिटेंट फास्टिंग की जगह डाइट प्लान में संतुलित और सेहतमंद खाना, 2 से 3 लीटर पानी, सब्जियां, फल, साबुत अनाज, सूखे मेवे और प्रोटीन वाली चीजें शामिल करना सेहत के लिए बेहतर हो सकता है। रोज कसरत भी जरूरी बताई गई है, क्योंकि यह एनर्जी और मेटाबॉलिज्म दोनों को बनाए रखने में मदद करती है। साथ ही पूरी नींद लेना भी उतना ही अहम है, क्योंकि नींद की कमी से भूख काबू करने वाले हार्मोन पर असर पड़ सकता है।
एनसीबीआई के मुताबिक उपवास के दौरान तेज कमजोरी, चक्कर, सिरदर्द, दिल की धड़कन तेज होना या दूसरे असामान्य लक्षण महसूस हों तो यह गंभीर समस्या हो सकती है। ऐसे में तुरंत डॉक्टर की सलाह लेने को कहा गया है। कोई भी नया डाइट प्लान शुरू करने से पहले सेहत के जानकार से सलाह लेने की बात भी कही गई है, ताकि वे आपकी सेहत की हालत देखकर सही डाइट प्लान सुझा सकें।