हुथी बंडखोरों पर बड़ी कार्रवाई की तैयारी, सऊदी अरब येमेनी सैनिकों को आगे रखेगा
रॉयटर्स के विशेष अहवाल के मुताबिक सऊदी अरब हुथियों के खिलाफ व्यापक सैन्य कार्रवाई की योजना बना रहा है, जिसमें सऊदी-समर्थित 1,00,000 से ज्यादा येमेनी सैनिक आगे रहेंगे।
पश्चिम एशिया में तनाव बहुत खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। ईरान युद्ध की वजह से होर्मुज की सामुद्रधुनी बंद हो गई। इसके बाद येमेन के हुथी बंडखोरों ने रेड सी (तांबडा समुद्र) को जोड़ने वाली बाब अल-मंदेब सामुद्रधुनी पर ताबा हासिल कर लिया। इससे दुनिया की तेल सप्लाई और समुद्री व्यापार पर संकट और गहरा हो गया है।
इस समुद्री नाकेबंदी का असर यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईंधन के दाम और माल ढुलाई का खर्च बेकाबू होकर बढ़ रहा है। इस संकट को खत्म करने के लिए सऊदी अरब ने हुथियों के खिलाफ व्यापक और निर्णायक सैन्य कार्रवाई की योजना बनाई है।
रॉयटर्स के विशेष अहवाल के मुताबिक रियाध इस बार अपनी फौज को सीधे जमीनी लड़ाई में उतारने के बजाय सऊदी-समर्थित 1,00,000 से ज्यादा येमेनी सैनिकों को आगे रखेगा। इस जमीनी मुहिम को सऊदी हवाई दल के भारी हवाई हमलों (Airstrikes) और रसद सप्लाई का मजबूत कवर दिया जाएगा। आने वाले कुछ हफ्तों में तटीय इलाके की अहम जगहों पर, और अल-बायदा, मारिब, तैझ और अल-जॉफ जैसे मुख्य मोर्चों पर चारों तरफ से हमला शुरू होने की संभावना जताई जा रही है।
बाब अल-मंदेब को तांबड़े समुद्र का दक्षिणी प्रवेशद्वार माना जाता है। यह एशिया और यूरोप के बीच समुद्री आवाजाही का मुख्य केंद्र है। ईरान की लड़ाई से होर्मुज की सामुद्रधुनी में रुकावट आने के बाद इस रास्ते की अहमियत कई गुना बढ़ गई है। सऊदी अरब के विश्लेषकों का कहना है कि अगर हुथियों ने बाब अल-मंदेब पर अपना नियंत्रण बनाए रखा तो वे अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर दबाव डालने के लिए इसका गलत इस्तेमाल करेंगे। उनके मुताबिक इससे आगे हुथियों के साथ किसी भी शांति बातचीत का होना नामुमकिन हो जाएगा। इसीलिए इस समुद्री रास्ते पर हुथियों की पकड़ ढीली करना सऊदी और उसके अंतरराष्ट्रीय साथियों की पहली जरूरत बन गई है।
इस पूरी सैन्य रणनीति में पाकिस्तान की भूमिका बेहद अहम और चौंकाने वाली मानी जा रही है। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए साझा रक्षा करार के तहत पाकिस्तान ने सऊदी अरब में 30,000 से 40,000 सैनिकों की टुकड़ी तैनात की है। इन पाकिस्तानी सैनिकों को सऊदी की सीमाओं की हिफाजत करने की जिम्मेदारी दी गई है। साथ ही हुथियों की तरफ से होने वाले संभावित ड्रोन और मिसाइल हमलों से सऊदी के तेल ढांचे (Oil Infrastructure) को सुरक्षा देना भी उनके जिम्मे है।
इसके अलावा पाकिस्तान ने पिछले महीने येमेन के एडन में चार मालवाहक विमान भेजे हैं। इनमें हवाई सुरक्षा प्रणाली, तोपखाना, ड्रोन और ड्रोन-विरोधी सिस्टम भरे थे। माना जा रहा है कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असिम मुनीर की अगुवाई में यह फौजी साझेदारी और मजबूत हुई है।
अमेरिका ने भी इस मुहिम में सऊदी अरब का साथ दिया है। अमेरिकी प्रशासन ने सऊदी और कतर की सुरक्षा के लिए पैट्रियट हवाई सुरक्षा प्रणाली तैनात की है। सैटेलाइट से मिलने वाली खुफिया जानकारी और हुथियों के ठिकानों की सटीक जानकारी सऊदी फौज को दी जा रही है। हालांकि मुहिम के सही समय और अमेरिका के सीधे शामिल होने को लेकर वॉशिंग्टन में अभी भी रणनीतिक चर्चा चल रही है।
फिर भी सऊदी अरब के सामने बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं। येमेन में हुथियों से लड़ने वाले स्थानीय गुट आपस में बंटे हुए हैं। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) समर्थित गुट और सऊदी-समर्थित गुट के बीच अंदरूनी मतभेद से मुहिम में दिक्कतें आ सकती हैं। इसके अलावा हुथी बंडखोर पहाड़ी इलाके में गुरिल्ला तरीके की लड़ाई (Guerrilla Warfare) में माहिर हैं, इसलिए यह लड़ाई लंबी और मुश्किल साबित हो सकती है।