हर साल 1 सितंबर को देशभर में मनता है राष्ट्रीय पोषण दिन, साथ चलता है पोषण सप्ताह
राष्ट्रीय पोषण दिन पर सरकार, स्वास्थ्य विभाग और संस्थाएं बच्चों, गर्भवती व स्तनदा माताओं और बुजुर्गों के पोषण पर जागरूकता कार्यक्रम चलाती हैं।
हर साल 1 सितंबर को देशभर में राष्ट्रीय पोषण दिन मनाया जाता है। इस दिन के साथ पोषण सप्ताह भी मनाया जाता है, जिसमें पूरे देश में सेहत से जुड़े अलग-अलग अभियान और जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाते हैं।
इस दिन को मनाने की वजह यह बताई जाती है कि आज की भागदौड़ वाली जिंदगी में बदलती लाइफस्टाइल, जंक फूड का बढ़ता चलन और बेतरतीब खान-पान की आदतों के चलते कई गंभीर बीमारियां घर-घर में दिखने लगी हैं। हालात सुधारने और लोगों को खान-पान की अहमियत समझाने के लिए ही यह दिन हर साल मनाया जाता है।
सही पोषण का मतलब सिर्फ पेट भरना नहीं है। इसका मतलब है कि शरीर को जरूरी प्रोटीन, विटामिन, मिनरल, कार्बोहाइड्रेट और चिकनाई वाले पदार्थ सही मात्रा में मिलें। राष्ट्रीय पोषण दिन के संदेश में कहा जाता है कि जब शरीर को ये सारे तत्व नियमित मिलते हैं, तभी शारीरिक विकास को ठीक से रफ्तार मिलती है और रोगों से लड़ने की ताकत मजबूत होती है। इसी संदेश में पोषण को मानसिक सेहत से भी जोड़ा जाता है और कहा जाता है कि सही खान-पान से तनाव कम करने और ध्यान लगाने में मदद मिलती है।
इस दिन के संदेश में यह भी बताया जाता है कि असंतुलित खान-पान के कारण मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और एनीमिया यानी खून की कमी जैसी बीमारियां चिंताजनक ढंग से बढ़ती दिख रही हैं। खासकर छोटे बच्चों और महिलाओं में एनीमिया की समस्या बड़े पैमाने पर पाई जाती है। संदेश के मुताबिक रोजमर्रा के खाने में ताजे फल, हरी पत्तेदार सब्जियां, दूध, दूध से बने पदार्थ, दालें और प्रोटीन वाली चीजें शामिल की जाएं तो इन बीमारियों से निपटा जा सकता है।
राष्ट्रीय पोषण दिन के मौके पर सरकार, स्वास्थ्य विभाग और कई स्वयंसेवी संस्थाएं मिलकर समाज में जागरूकता फैलाती हैं। इस मुहिम में खास तौर पर तीन तबकों पर जोर रहता है, यानी छोटे बच्चे, गर्भवती व स्तनदा माताएं और बुजुर्ग। बच्चों को शुरुआती उम्र में मिलने वाला सही पोषण उनके आगे की बौद्धिक और शारीरिक बढ़त की नींव माना जाता है। वहीं गर्भवती महिलाओं को सही खुराक मिलने से कुपोषण और बाल मृत्यु को रोकने में बड़ी मदद मिलने की बात कही जाती है।
इस खास दिन पर स्कूल, कॉलेज, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामाजिक संस्थाओं के जरिए हेल्थ चेकअप कैंप, वर्कशॉप, नुक्कड़ नाटक और डाइटीशियन के व्याख्यान रखे जाते हैं। इन कार्यक्रमों में लोगों को प्रैक्टिकल करके दिखाया जाता है कि अपने इलाके में मिलने वाली पौष्टिक चीजों को खाने में कैसे इस्तेमाल किया जाए।
कुल मिलाकर इस दिन का संदेश यह है कि कोई भी महंगा सप्लीमेंट या दवा प्राकृतिक आहार की जगह नहीं ले सकती। रसोई और स्थानीय बाजार में मिलने वाला ताजा, प्राकृतिक और मौसमी खाना ही सेहत का असली सुरक्षा कवच बताया जाता है। रोज की दिनचर्या में प्रोसेस्ड और जंक फूड से बचकर पारंपरिक, पौष्टिक और संतुलित खाने को अपनाना वक्त की जरूरत कहा गया है। राष्ट्रीय पोषण दिन को सिर्फ एक दिन का जश्न नहीं, बल्कि स्वस्थ, सशक्त और समृद्ध भारत के निर्माण की दिशा में उठाया गया एक अहम कदम बताया जाता है।