हाईकोर्ट की फटकार: सरकारी अधिकारी जनता के सेवक हैं, मालिक नहीं
नागपुर खंडपीठ ने सालों तक अर्जियां लटकाने वाले अधिकारियों पर नाराजगी जताई; चेंबूर झोपड़पट्टी पुनर्वसन (झोपु) प्रोजेक्ट पर भी टिप्पणी।
बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच (High Court of Bombay Nagpur Bench) ने उन सरकारी अधिकारियों के ढीले कामकाज पर सख्त टिप्पणी की है, जो नागरिकों के अर्ज और निवेदन सालों तक पेंडिंग रखते हैं। कोर्ट ने कहा कि सरकारी अधिकारी जनता के सेवक हैं, मालिक नहीं। इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताई।
मामला याचिकाकर्ता दिलीप ठाकरे का है। उन्होंने सेवा से जुड़ी अपनी मांग को लेकर 2018 से नवंबर 2023 के बीच नागपुर के विभागीय आयुक्त और जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को कई निवेदन दिए थे। पूरे छह साल गुजर जाने के बाद भी उन पर कोई फैसला नहीं हुआ। इसी वजह से उन्हें हाईकोर्ट में याचिका दायर करनी पड़ी।
कोर्ट ने 31 अगस्त 2026 को ग्रामविकास विभाग के मुख्य सचिव को आदेश दिया था कि वे खुद इस मामले की जांच करें और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई करें। लेकिन सचिव ने जांच उसी जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों को सौंप दी, जिन पर आरोप थे। सचिव के इस ढीले कामकाज पर कोर्ट ने तीखी नाराजगी जताई।
कोर्ट ने कहा कि अधिकारी वक्त पर काम नहीं करते, इसलिए नागरिकों को कोर्ट की तरफ दौड़ना पड़ता है। ऐसी याचिकाओं में कोर्ट का काफी वक्त जाया होता है। कोर्ट ने ग्रामविकास विभाग के सचिव को 6 अक्टूबर तक हलफनामा (प्रतिज्ञापत्र) पेश करने का आदेश दिया है। अब देखना अहम होगा कि इस मामले में आगे कोर्ट क्या फैसला देता है।
इसी बीच, चेंबूर के SRA (झोपड़पट्टी पुनर्विकास) प्रोजेक्ट पर भी हाईकोर्ट ने टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि सरकारी जमीन पर अतिक्रमण के बाद सरकार से निष्क्रिय रहने की उम्मीद नहीं की जाती। सार्वजनिक संपत्ति को बचाने और उसके पुनर्विकास की जिम्मेदारी सरकार की है, यह भी कोर्ट ने साफ किया।
चेंबूर में करीब 66 हजार वर्ग मीटर सरकारी जमीन पर यह प्रोजेक्ट 20 साल से अटका है। 2006 से कोशिशें चल रही हैं, पर पुनर्विकास की अब तक एक ईंट भी नहीं रखी गई। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी में कहा कि सार्वजनिक जमीनों पर खुलेआम अतिक्रमण होने देने के बाद सरकार या संबंधित प्राधिकरणों का मूक दर्शक बने रहना दुखद और चिंताजनक है।
आदिशक्ति डेवलपर्स के बाद 2021 में रुपारेल बिल्डकॉन को डेवलपर नियुक्त किया गया था। हाईकोर्ट ने रुपारेल को हटाने से फौरन इनकार कर दिया। कोर्ट के मुताबिक डेवलपर का बड़ा निवेश और प्रोजेक्ट के लिए किया गया काम नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि 51 फीसदी सहमति न होने के दावे पर डेवलपर नहीं बदला जा सकता, इसके लिए गंभीर कानूनी गड़बड़ी जरूरी है। कोर्ट की राय है कि झोपड़ीधारकों को पुनर्वास का अधिकार है, लेकिन सरकारी जमीन पर मालिकाना हक जैसे अधिकार नहीं हैं। डेवलपर की नियुक्ति पर एतराज हो तो SRA CEO या सक्षम प्राधिकरण के पास जाने को कहा गया है, और शिकायतों पर 6 हफ्तों में फैसला लेने का आदेश दिया गया है।
कोर्ट ने प्रशासन को निर्देश दिया है कि पुनर्वास योजना कागज पर न रहे और तय वक्त में पूरी हो। जरूरत पड़े तो पात्र झोपड़ीधारकों का कहीं और पुनर्वास कर जमीन को सार्वजनिक काम के लिए इस्तेमाल करने पर भी विचार करने को कहा गया है। कोर्ट ने माना कि प्राइवेट डेवलपरों के कारोबारी विवादों की वजह से सरकारी जमीन के प्रोजेक्ट का सालों अटकना ठीक नहीं है, और सरकार को 'निष्क्रिय जमीन मालिक' की भूमिका छोड़कर सक्रिय पहल करनी चाहिए।