गौरी-गणपती विसर्जन की परंपरा, कैसे होती है घर में पूजा से लेकर विदाई तक की रस्म
गणेशोत्सव में गौरी और गणपती की विदाई की रीत, पूजा से लेकर विसर्जन तक क्या-क्या होता है
गणेशोत्सव में गणपती बाप्पा के साथ-साथ गौरी का भी बड़ी भक्ति से स्वागत और पूजन किया जाता है। महाराष्ट्र के कई घरों में गौरी के आने के बाद उसकी खास पूजा, नैवेद्य और आरती होती है। इसके बाद परंपरा के मुताबिक गौरी और गणपती का विसर्जन किया जाता है। इस विसर्जन का धार्मिक श्रद्धा के साथ-साथ भावनात्मक और सांस्कृतिक महत्व भी बहुत है।
गणपती और गौरी का घर में आना कई परिवारों के लिए सुख, समृद्धि और मंगल के आने जैसा माना जाता है। कुछ दिन पूजा-पाठ और मेहमान की तरह खातिरदारी करने के बाद उन्हें विदा करने की रीत है। विसर्जन का मतलब देवी-देवता का हमेशा के लिए दूर चले जाना नहीं, बल्कि उनके मूल स्वरूप में वापस लौटने का प्रतीक माना जाता है।
गौरी विसर्जन के दिन सुबह या घर की परंपरा के हिसाब से तय वक्त पर पूजा और आरती की जाती है। गौरी को नैवेद्य दिखाकर, हल्दी-कुंकू और ओटी भरकर उसे विदा किया जाता है। इसके बाद गौरी का विसर्जन होता है। कुछ घरों में गौरी और गणपती का विसर्जन एक ही दिन होता है, तो कुछ परिवारों में दोनों के विसर्जन का वक्त या दिन अलग-अलग हो सकता है। यह तरीका स्थानीय परंपरा और घर के कुल-रिवाज के हिसाब से बदलता रहता है।
गौरी-गणपती को विदा करते वक्त भक्ति भाव से आरती की जाती है और गणपती बाप्पा मोरया, अगले साल जल्दी आओ, जैसे जयकारों के साथ विसर्जन का जुलूस निकाला जाता है। गौरी को विदा करते वक्त उसकी कृपा से घर में सुख-समृद्धि बनी रहे, ऐसी प्रार्थना की जाती है।
महाराष्ट्र के कई परिवारों के लिए गौरी सिर्फ देवी नहीं, बल्कि मायके आई हुई बेटी जैसी मानी जाती है। उसका आना उत्साह से मनाया जाता है और विसर्जन के वक्त माहौल भावुक हो जाता है। यही वजह है कि गौरी विसर्जन को भक्ति, परंपरा और घर की भावनाओं का सुंदर संगम माना जाता है।
आजकल कई परिवार पर्यावरण का ख्याल रखते हुए गौरी-गणपती का विसर्जन कृत्रिम तालाब में या घर में ही पानी के टब में करना पसंद कर रहे हैं। शाडू मिट्टी की मूर्तियां, नैसर्गिक सजावट और पर्यावरण के अनुकूल सामान का इस्तेमाल कर उत्सव मनाने का संदेश दिया जा रहा है।
महाराष्ट्र के अलग-अलग हिस्सों में गौरी की स्थापना से लेकर विसर्जन तक के तरीके अलग-अलग हैं। कहीं मुखौटों के रूप में, तो कहीं पत्थर, मिट्टी या दूसरे पारंपरिक रूप में गौरी की पूजा की जाती है। लेकिन इन सभी परंपराओं के पीछे भक्ति भाव और घर में सुख-समृद्धि के लिए की जाने वाली प्रार्थना एक जैसी ही होती है।