गणेशोत्सव में दुर्वा चढ़ाने का सही तरीका क्या है, जानिए इससे जुड़ी पौराणिक कथा
गणपति बप्पा को दुर्वा सिर पर चढ़ाने की परंपरा के पीछे अनलासुर राक्षस की कथा और 21 दुर्वा की जुड़ी का महत्व।
14 सितंबर से भाद्रपद चतुर्थी शुरू होकर अनंत चतुर्दशी तक बप्पा का उत्सव चलता है। इन दिनों घर-घर में पूजा होती है और दुर्वा चढ़ाई जाती है, लेकिन ज्यादातर लोग दुर्वा की जुड़ी उठाकर सीधे बप्पा के पैरों पर रख देते हैं। शास्त्र के मुताबिक यह तरीका गलत है। दुर्वा पैरों पर नहीं बल्कि सिर पर चढ़ानी चाहिए, और इसके पीछे एक पुरानी पौराणिक कथा है।
बहुत साल पहले अनलासुर नाम का एक राक्षस हुआ करता था, जो इतना खतरनाक था कि उसके मुंह से लगातार आग निकलती रहती थी। उस आग से सारे ऋषि, देवता और आम लोग जलते जा रहे थे और चारों तरफ हाहाकार मच गया था। तब सारे देवता गणपति बप्पा के पास गए और उनसे बचाने की गुहार लगाई। सबकी रक्षा के लिए बप्पा ने अनलासुर को निगल लिया और अपने पेट में उतार लिया।
राक्षस को पेट में लेने के बाद उसके शरीर की आग की वजह से बप्पा के पेट और पूरे शरीर में भयंकर जलन शुरू हो गई। दाह बढ़ता ही गया। देवताओं ने बप्पा को ठंडा करने के लिए चंद्रमा लाकर आजमाया, चंदन का लेप भी लगाया, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा।
बप्पा की जलन शांत ही नहीं हो रही थी। आखिर में कश्यप ऋषि और उनके साथ 88 हजार ऋषियों ने मिलकर एक उपाय निकाला। हर एक ऋषि ने 21 दुर्वा की जुड़ी बनाई और उसे बप्पा के सिर पर रख दिया। दुर्वा ठंडी और औषधीय होती है, उसके स्पर्श से बप्पा के शरीर की सारी जलन पल भर में शांत हो गई। बप्पा को एकदम राहत महसूस हुई। इस पर बप्पा खुश हो गए और बोले कि जो भी मुझे दुर्वा चढ़ाएगा, मैं उस पर हमेशा प्रसन्न रहूंगा।
इसी कथा से पता चलता है कि दुर्वा कहां और क्यों चढ़ानी चाहिए। बप्पा की जलन शांत करने के लिए दुर्वा सिर पर रखी गई थी, पैरों पर नहीं। इसलिए दुर्वा हमेशा बप्पा के मस्तक पर या कान के पास ही रखनी चाहिए। अगर मूर्ति बड़ी हो और सिर पर दुर्वा रखना मुमकिन न हो, तो 21 या 108 दुर्वा की जुड़ी से माला बनाकर बप्पा के गले में पहनाई जा सकती है। फूल पैरों पर चढ़ाए जाते हैं, दुर्वा नहीं। दुर्वा बप्पा का सिर ठंडा करने वाली वनस्पति है, इसीलिए उसका सम्मान सिर पर ही है।
दुर्वा लेते वक्त एक और बात का ध्यान रखना चाहिए। दुर्वा में हमेशा तीन पत्ते होते हैं, जिसे त्रिदल कहा जाता है। ये तीन पत्ते इंसान के तीन गुणों यानी सत्व, रज और तम के प्रतीक माने जाते हैं। जुड़ी हमेशा 21 दुर्वा की ही क्यों बनाई जाती है, इसकी वजह यह है कि 21 का आंकड़ा बप्पा को बहुत प्रिय है। हमारे शरीर की 5 ज्ञानेंद्रियां, 5 कर्मेंद्रियां, 5 प्राण, 5 महाभूत और 1 मन मिलाकर कुल 21 होते हैं, इसीलिए बप्पा को 21 दुर्वा की जुड़ी चढ़ाई जाती है। तो इस गणेशोत्सव में जब भी बप्पा की पूजा करें, यह छोटी सी बात जरूर ध्यान रखें कि दुर्वा पैरों पर न रखकर हाथ से प्यार से बप्पा के सिर पर रखें। बप्पा जरूर प्रसन्न होंगे।