छोटे शहरों में भी बढ़ी वजन घटाने की दवाओं की मांग, महिलाओं में खास रुझान
सस्ते जेनेरिक विकल्पों और डिजिटल हेल्थ सेवाओं की वजह से टियर-२ और टियर-३ शहरों में मेडिकल वेट मैनेजमेंट की मांग बढ़ी है।
वजन घटाने का बाजार अब सिर्फ बड़े महानगरों तक सीमित नहीं रहा। सस्ते जीएलपी-१ विकल्प और डिजिटल हेल्थ सेवाएं आसानी से मिलने लगी हैं। इसकी वजह से टियर-२ और टियर-३ शहरों में मेडिकल वेट मैनेजमेंट की मांग काफी बढ़ गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक महिलाओं में वजन, डायबिटीज और मेटाबॉलिक दिक्कतों के लिए डॉक्टरों की निगरानी में इलाज की मांग बढ़ती दिख रही है।
फार्मास्युटिकल्स के आंकड़ों के मुताबिक भारत में जीएलपी-१ एगोनिस्ट का बाजार मई २०२६ में करीब १,९०६ करोड़ तक पहुंच गया। एक साल पहले यह करीब ५६५ करोड़ था। इस तेज बढ़त की सबसे बड़ी वजह सेमाग्लुटाइड के कम कीमत वाले जेनेरिक विकल्पों का बाजार में आना बताई गई है।
मार्च २०२६ में सेमाग्लुटाइड का भारतीय पेटेंट खत्म हुआ। इसके बाद कई देसी कंपनियों ने इसके जेनेरिक वर्जन बाजार में उतार दिए। इससे इलाज का खर्च काफी घट गया है। कुछ जेनेरिक विकल्पों की कीमत मूल ब्रांड से बहुत कम है। इसलिए उम्मीद है कि टियर-२ और टियर-३ शहरों में भी जीएलपी-१ पर आधारित इलाज की पहुंच बढ़ेगी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाओं में पीसीओएस (पॉलीसिस्टिक ओव्हरी सिंड्रोम), इंसुलिन रेजिस्टेंस और मोटापे जैसी स्थितियों की वजह से वजन मैनेजमेंट के इलाज की जरूरत बढ़ सकती है।
बताया गया है कि जीएलपी-१ दवाएं हर किसी के लिए ठीक नहीं होतीं। इन्हें डॉक्टर की सलाह और उनकी निगरानी में ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। विशेषज्ञ इन दवाओं को सौंदर्य के लिए इस्तेमाल करने और उनके गलत इस्तेमाल को लेकर भी सावधानी बरतने की सलाह देते हैं।
इस बाजार की प्रमुख दवाओं में सेमाग्लुटाइड और टिर्झपेटाइड का नाम लिया गया है। इनका मुख्य इस्तेमाल टाइप २ डायबिटीज और मेडिकल वेट मैनेजमेंट में बताया गया है।
महाराष्ट्र में मुंबई के अलावा पुणे, नागपुर, नाशिक, संभाजीनगर और कोल्हापुर जैसे शहरों में हेल्थ सेवाओं और विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने के लिहाज से यह बाजार अहम साबित हो सकता है।