चाणक्य नीति: बच्चों को मेहनती और जिम्मेदार बनाने वाले पैसों से जुड़े 5 सबक
चाणक्य नीति के मुताबिक 15 साल की उम्र तक बच्चों को पैसों की सही समझ दे देनी चाहिए, ताकि आगे चलकर वे समझदारी से आर्थिक फैसले ले सकें।
कामयाब जिंदगी के लिए पैसों का सही इस्तेमाल और उनकी सही देखभाल बहुत मायने रखती है, ऐसा चाणक्य नीति में बताया गया है। सिर्फ पढ़ाई और करियर की बातें बच्चों को बताना काफी नहीं है। आजकल के जमाने में बच्चों को 15 साल की उम्र से ही पैसों की सही समझ यानी फाइनेंशियल लिटरेसी देना भी जरूरी हो गया है। अगर बच्चे शुरुआत में ही पॉकेट मनी से लेकर बचत, खर्च और कर्ज जैसी बातें समझ लें, तो आगे चलकर वे पैसों को लेकर ज्यादा समझदारी से फैसले ले पाएंगे। चाणक्य ने 15 साल की उम्र तक बच्चों को फाइनेंशियल लिटरेसी को लेकर क्या-क्या सिखाने की बात कही है, यह जान लेते हैं।
पहली बात पॉकेट मनी की है। ज्यादातर बच्चों के लिए पॉकेट मनी सिर्फ वो पैसे होते हैं जो हाथ में आते हैं और फौरन खर्च हो जाते हैं। लेकिन पैसा कमाने के लिए मेहनत और मूल्य बनाना पड़ता है, यह बात बच्चों को समझनी बहुत जरूरी है। चाणक्य के मुताबिक 15 साल की उम्र तक बच्चों को यह समझ आ जाना चाहिए कि सिर्फ जेब में हाथ डालने से पैसे नहीं मिलते। इसलिए छोटी उम्र में ही बच्चों को ऐसे कामों में शामिल होने का मौका देना चाहिए, जहां वे अपनी मेहनत के बदले पैसे कमाने का अनुभव ले सकें। जैसे घर के बाहर कोई छोटा-मोटा काम पूरा करना, अपने बगीचे की सब्जियां बेचना या खुद कोई छोटी चीज बनाकर बेचना। इसमें कितने पैसे मिले, यह जरूरी नहीं है, बल्कि मेहनत और उससे होने वाली कमाई के बीच का सीधा रिश्ता समझना जरूरी है।
दूसरी बात बचत करने की है। अक्सर बच्चों को यह सिखाया जाता है कि पैसे खर्च न करना ही बचत है। लेकिन इससे बेहतर आदत यह है कि पैसे हाथ में आते ही उसका कुछ हिस्सा अलग रख दिया जाए और बाकी बचा पैसा ही खर्च किया जाए। मसलन अगर किसी बच्चे को 200 रुपये मिलें, तो वह पहले ही तय कर सकता है कि इसमें से कितनी रकम बचानी है और बाकी कितनी खर्च करनी है। रकम को लेकर कोई पक्का नियम होने की जरूरत नहीं, लेकिन नियमित रूप से बचत करने की आदत बहुत मायने रखती है। अगर बच्चे 15 साल की उम्र तक ही खर्च करने और बचत करने की आदत सीख लें, तो बड़े होने पर उन्हें पैसों की दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ेगा।
तीसरी बात पैसों की असली कीमत समझने से जुड़ी है। चाणक्य नीति के मुताबिक बच्चों को यह समझना चाहिए कि 3,000 रुपये की कोई चीज सिर्फ उतनी रकम नहीं होती, बल्कि उसमें किसी की मेहनत, वक्त और श्रम भी शामिल होता है। कोई चीज खरीदने से पहले यह सोचना चाहिए कि उसके लिए पैसा कमाने में कितनी मेहनत लगती है। इसका मकसद बच्चों को पैसे खर्च करने पर दोषी महसूस कराना नहीं, बल्कि पैसों की असली कीमत समझाना है।
चौथी और आखिरी बात उधार के पैसों की है। चाणक्य ने कर्ज न लेने की साफ सलाह दी थी, फिर भी उन्होंने यह भी माना था कि कर्ज लेने से पूरी तरह बचना हमेशा मुमकिन नहीं होता। चाणक्य का जोर इस बात पर था कि बच्चों को शुरू से ही यह समझ लेना चाहिए कि उधार के पैसे मुफ्त नहीं होते और उन्हें ब्याज के साथ चुकाना पड़ सकता है। उनका कहना था कि कर्ज लेने वाला व्यक्ति अपने भविष्य के कुछ फैसलों पर काबू दूसरे पक्ष के हाथ में सौंप देता है, चाहे वह होम लोन हो, गाड़ी की किस्तें (EMI) हों या क्रेडिट कार्ड का बकाया हो।