बोरी के हनुमान क्रीड़ा मंडल की साखरचौथ गणपति झांकी, मराठी अस्मिता और इतिहास पर जोर
पेण तालुका के बोरी में हनुमान क्रीडा मंडल का 34वां साल, मराठी कर्तृत्व और इतिहास पर देखावा
पेण तालुका के बोरी गांव में हनुमान क्रीड़ा मंडल ने इस साल साखरचौथ गणपति की जो झांकी बनाई है, वह लोगों का ध्यान खींच रही है। यह झांकी मराठी अस्मिता और इतिहास को सामने रखती है। मंडल का यह 34वां साल है और पिछली तीन पीढ़ियों की एकजुटता इसकी खास पहचान बन गई है।
झांकी की सजावट विनीत तांडेल और आशिष नाईक ने की है, जबकि मूर्ति सूरज पाटील और चैतन्य म्हात्रे ने बनाई है। झांकी में लेखक, साहित्यकार, कलाकार और गायक समेत अलग-अलग क्षेत्रों के मराठी लोगों की उपलब्धियों को रखा गया है। इन हस्तियों की तस्वीरें और फ्रेम लगाए गए हैं। इनके जरिए मराठी आदमी की तरक्की, उसकी सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक योगदान और देश की राजनीति में उसके ऐतिहासिक स्थान को उभारा गया है।
झांकी में फिल्म, नाटक, साहित्य, शिक्षा, कला, संस्कृति, उद्योग और समाजसेवा जैसे क्षेत्रों में मराठी लोगों के सफर की झलक मिलती है। मंडल के कार्यकर्ताओं ने बताया कि इसके पीछे भावना यह है कि मराठी आदमी चाहे किसी भी क्षेत्र में जाए, अपनी काबिलियत की छाप छोड़ सकता है, और उसके कदम लगातार तरक्की की तरफ बढ़ते रहें।
इतिहास वाला हिस्सा व्यंग के साथ पेश किया गया है। 'दिल्ली के तख्त की रखवाली करते हैं' से लेकर 'आखिर में मधान्द तख्त फोड़ते हैं मराठी' तक के वाक्यों के जरिए मराठों के ऐतिहासिक पराक्रम का जिक्र है। छत्रपति शिवाजी महाराज, छत्रपति संभाजी महाराज और आगे के दौर में मराठा सत्ता के फैलाव की पृष्ठभूमि भी झांकी में रखी गई है। दक्षिण से उत्तर भारत तक मराठा सत्ता के विस्तार और दिल्ली की राजनीति में मराठों की भूमिका की याद दिलाई गई है।
'आखिर में मधान्द तख्त फोड़ते हैं मराठी' वाला व्यंग्यात्मक वाक्य इतिहास को आज के हालात से जोड़ता है। इसके जरिए मराठी भाषा और मराठी आदमी के सामने मौजूदा चुनौतियों पर सामाजिक टिप्पणी करने की कोशिश की गई है।
झांकी की सजावट करने वाले विनीत तांडेल ने मराठी अस्मिता, इतिहास और आज के मराठी समाज की राह, इन तीनों बातों को ध्यान में रखकर इसे तैयार किया। इतिहास में मराठी आदमी ने पराक्रम और अपनी उपलब्धियों के दम पर देश की राजनीति में अहम जगह बनाई। साथ ही आज मराठी भाषा और संस्कृति के सामने जो चुनौतियां हैं, उनकी तरफ भी ध्यान खींचने की कोशिश है। संदेश यह है कि मराठी भाषा, संस्कृति और अस्मिता को बचाना सिर्फ एक पीढ़ी की जिम्मेदारी नहीं है, यह विरासत आगे की पीढ़ियों तक पहुंचानी जरूरी है।
मंडल के कार्यकर्ता तीन पीढ़ियों से पूरी एकजुटता के साथ गणेश उत्सव मनाते आ रहे हैं। इसी वजह से धार्मिक उत्सव के साथ-साथ सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विषयों पर जागरूकता भी फैलाई जाती है। इस उत्सव ने इसके लिए एक मंच के तौर पर अपनी अलग पहचान बनाई है।
साखरचौथ गणपति के मौके पर धार्मिक श्रद्धा के साथ इतिहास, संस्कृति और सामाजिक चेतना का मेल करने वाली यह झांकी बोरी इलाके के लोगों का ध्यान खींच रही है। झांकी के जरिए उम्मीद जताई गई है कि नई पीढ़ी अपने इतिहास पर गर्व करे, आधुनिक क्षेत्रों में भी आगे बढ़े और मराठी अस्मिता को संभालते हुए तरक्की करे। 34 साल की परंपरा और तीन पीढ़ियों की एकजुटता के चलते बोरी के हनुमान क्रीड़ा मंडल का यह उत्सव सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि इतिहास, संस्कृति, उपलब्धियों और सामाजिक चेतना का उत्सव बन गया है।