बैल पोला: विदर्भ-मराठवाड़ा में किसानों ने बैलों की पूजा कर मनाया कृतज्ञता का त्योहार
श्रावण अमावस्या पर महाराष्ट्र में हर साल मनाए जाने वाले बैल पोला त्योहार में किसान अपने बैलों को दिनभर आराम देकर, नहला-धुलाकर और सजाकर उनकी पूजा करते हैं।
महाराष्ट्र और मध्य भारत के गांवों में खेती से जुड़े त्योहार सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इंसान, मिट्टी और मवेशियों के रिश्ते को मनाने का जरिया बन जाते हैं। ऐसा ही एक त्योहार है बैल पोला, जो हर साल श्रावण महीने की अमावस्या को विदर्भ और मराठवाड़ा में खासे जोश के साथ मनाया जाता है।
साल भर खेतों में जुते रहने वाले बैलों के लिए यह दिन आराम और सम्मान का होता है। पोला के रोज बैलों से कोई काम नहीं लिया जाता, बल्कि उन्हें घर के किसी बुजुर्ग सदस्य की तरह पूजा जाता है।
इस त्योहार के पीछे एक पुरानी कहानी भी जुड़ी है। कहते हैं कि जब कृष्ण भगवान बचपन में थे, तब कंस ने उन्हें मारने के लिए पोलासुर नाम के राक्षस को सांड़ के भेस में भेजा था, लेकिन बाल कृष्ण ने उसे पहचानकर मार गिराया। इसी वजह से यह दिन बैलों के साथ-साथ बच्चों के लिए प्यार जताने का भी दिन माना जाता है। कुछ लोग इसे भगवान शिव के वाहन नंदी की भक्ति से भी जोड़ते हैं।
इतिहास की बात करें तो वैदिक काल से ही मवेशियों को खुशहाली की निशानी माना जाता रहा है। यादव राजाओं के जमाने में मवेशियों की पूजा से जुड़ी रस्में और बढ़ीं, और छत्रपति शिवाजी महाराज के मराठा साम्राज्य में यह त्योहार गांव की जिंदगी का बड़ा हिस्सा बन गया।
पोला की तैयारी एक दिन पहले से ही शुरू हो जाती है। इस रात 'वेसन तोड़ी' यानी बैलों की नाक की रस्सी ढीली करना और 'खांदशेखणी' यानी घी या घर के मक्खन से उनके कंधों की मालिश करना, जैसी रस्में निभाई जाती हैं।
त्योहार के दिन सुबह-सुबह किसान बैलों को नदी या तालाब ले जाकर अच्छे से नहलाते हैं। इसके बाद उनका शृंगार होता है, सींगों पर रंग चढ़ाया जाता है, गले में नए घुंघरू और कौड़ियों की माला बांधी जाती है, और पीठ पर रेशमी और कढ़ाई वाला कपड़ा डाला जाता है। दोपहर बाद ढोल-ताशे और लेझिम की धुन पर सजे-धजे बैलों की गांव में शानदार परेड निकलती है। बैल जब घर लौटते हैं तो महिलाएं दरवाजे पर रंगोली बनाती हैं, घी का दीया जलाकर उनकी आरती उतारती हैं, सींगों पर हल्दी-कुमकुम लगाती हैं और पैर छूकर आशीर्वाद लेती हैं।
पोला की एक खास बात यह भी है कि घर के लोग खाना खाने से पहले बैलों को खिलाते हैं। इस दिन हर घर में चने की दाल और गुड़ से बनी मशहूर मीठी रोटी पूरनपोली बनती है। इसके अलावा करंजी, बाजरे की भाकरी, कढ़ी, वड़ा-भात और मसालेदार सब्जियां भी बनाई जाती हैं।
पोला के अगले दिन नागपुर जिले और विदर्भ में बच्चों के लिए 'तान्हा पोला' मनाया जाता है। यह परंपरा 1789 में नागपुर के राजा श्रीमंत राजे रघुजी महाराज भोंसले (द्वितीय) ने शुरू की थी, ताकि बच्चों में मवेशियों के प्रति लगाव और खेती की अहमियत समझ बढ़े। बच्चे लकड़ी या मिट्टी के छोटे बैल सजाकर जुलूस निकालते हैं और घर-घर जाकर गिफ्ट और मिठाइयां पाते हैं।
अब इस त्योहार में पर्यावरण और बैलों की सेहत का ध्यान भी रखा जाने लगा है। सांगली जिले के कानडवाड़ी गांव में एनिमल राहत संस्था की मदद से किसानों ने बैलों के सींग छीलने और उन पर केमिकल पेंट लगाने की पुरानी प्रथा पूरी तरह छोड़ दी है, क्योंकि इससे बैलों को सींग के कैंसर और स्किन एलर्जी का खतरा रहता था। अब किसान हल्दी के नेचुरल लेप और रंग-बिरंगे रिबन से बैलों को सजाते हैं, जो पूरी तरह सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल है।