अंतिम संस्कार में कपालक्रिया: खोपड़ी टूटने की प्रतीक्षा और उससे जुड़ी मान्यताएं
दाह संस्कार में कई जगह खोपड़ी के टूटने का इंतज़ार किया जाता है और इसे कपालक्रिया से जोड़ा जाता है। मान्यताएं अलग-अलग हैं, जबकि खोपड़ी का फूटना हड्डियों पर गर्मी के असर से होता है।
चिता जलते समय खोपड़ी के फूटने या उसमें दरार पड़ने का इंतज़ार क्यों किया जाता है, यह सवाल कई लोगों के मन में उठता है। कुछ हिंदू अंतिम संस्कार परंपराओं में कपालक्रिया को आत्मा की मुक्ति से जोड़ा जाता है। हालांकि हर परंपरा में यह विधि एक जैसी नहीं होती।
कई स्थानीय परंपराओं में दाह के दौरान देह की खोपड़ी के फूटने का इंतज़ार किया जाता है। कुछ जगहों पर इसके लिए बाकायदा विधि भी की जाती है, जिसे कपालक्रिया कहा जाता है। धार्मिक नज़रिये से मानव शरीर पंचमहाभूतों से बना माना जाता है। हिंदू तत्त्वज्ञान की धारणा है कि मृत्यु के बाद शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन तत्त्वों में मिल जाता है। कपालक्रिया को देह के नश्वर होने और आत्मा की आगे की यात्रा का प्रतीक माना जाता है।
अब सवाल यह है कि कपालक्रिया क्या है। दाह के समय मृतदेह पर घी डालकर चिता को मुखाग्नि दी जाती है। चिता जलने पर शरीर के ऊतक यानी त्वचा, अंग और मांस जल्दी जल जाते हैं, लेकिन हड्डियां, खासकर खोपड़ी की हड्डी, जल्दी नहीं जलती। हिंदू समाज के कई अंतिम संस्कारों में चिता जलने के बाद खोपड़ी को लकड़ी की डंडी की मदद से तोड़ा या फोड़ा जाता है।
मान्यता है कि कपाल, यानी माथा या खोपड़ी, देह से निकलने वाली आत्मा के लिए मोक्ष के मार्ग का आखिरी पड़ाव होता है। इसी खोपड़ी में मस्तिष्क होता है, जो चेतना का मुख्य ठिकाना है और जिसे प्राण भी कहा जाता है। उस प्राण को मुक्त करने के लिए कपालक्रिया की जाती है। प्राचीन काल में दाह संस्कार के बाद खोपड़ी साबुत बची रहती थी तो उसे 'अपूर्ण दाह' कहा जाता था।
कहा जाता है कि मृत व्यक्ति की आत्मा को देह के बंधन से छुड़ाने के लिए यह क्रिया की जाती है। कुछ जगहों पर इसे मृतक का बेटा या अंतिम संस्कार की ज़िम्मेदारी संभालने वाला व्यक्ति करता है। पर यह प्रथा सभी हिंदू समाजों में एक जैसी नहीं है।
कुछ और मान्यताओं के अनुसार, बिना जली साबुत खोपड़ी का इस्तेमाल तांत्रिक गलत कामों के लिए न हो, इसलिए भी यह क्रिया की जाती है। यह भी माना जाता है कि जब तक मृतदेह पूरी तरह राख नहीं बन जाता, तब तक उस व्यक्ति की देह से जुड़ी शोक की भावना, प्रेम और रिश्ते का खिंचाव खत्म नहीं हो सकते। कपालक्रिया की प्रथा व्यक्ति के भौतिक अस्तित्व के अंत को दर्शाती है।
विज्ञान के हिसाब से खोपड़ी का फूटना गर्मी की वजह से हड्डियों में होने वाले बदलावों के कारण होता है। आत्मा की मुक्ति का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।


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