मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

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19:47 IST

30 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस, भाषाओं के बीच पुल बनाने वालों का सम्मान

संयुक्त राष्ट्र ने 24 मई 2017 को 30 सितंबर को अनुवाद दिवस घोषित किया था, यह दिन सेंट जेरोम की याद से जुड़ा है।

30 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस, भाषाओं के बीच पुल बनाने वालों का सम्मान
एआई से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर; यह घटना का वास्तविक फोटो नहीं है | PT24

दुनिया में हजारों भाषाएं बोली जाती हैं और हर भाषा की अपनी अलग पहचान, खूबसूरती और इतिहास होता है। जब अलग-अलग भाषा बोलने वाले लोग या समाज आपस में जुड़ते हैं, तो उनके बीच बात पहुंचाने का काम अनुवादक (Translators & Interpreters) करते हैं। भाषाई विविधता को बचाने, अलग-अलग संस्कृतियों के बीच की दूरी कम करने और दुनिया भर में बातचीत को बढ़ावा देने के मकसद से हर साल 30 सितंबर को 'अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस' (International Translation Day) मनाया जाता है।

इस दिन को मनाने की परंपरा सेंट जेरोम (St. Jerome) की याद से जुड़ी है। सेंट जेरोम को बाइबल का लैटिन भाषा में अनुवाद करने वाले शुरुआती अनुवादक माना जाता है और उन्हें अनुवादकों का संरक्षक (Patron Saint of Translators) कहा जाता है। उनका निधन 30 सितंबर 420 को हुआ था। उनके इस ऐतिहासिक योगदान की याद में, और आज के दौर में भाषा की दूरी मिटाने वाले सभी भाषा विशेषज्ञों की मेहनत को मान देने के लिए संयुक्त राष्ट्र (UN) ने 24 मई 2017 को 30 सितंबर को आधिकारिक तौर पर 'अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस' घोषित किया।

अनुवाद सिर्फ शब्दों को बदलना नहीं है। बहुत से लोगों को लगता है कि अनुवाद यानी एक भाषा के शब्द की जगह दूसरी भाषा में वैसा ही शब्द लिख देना। लेकिन हकीकत इससे काफी अलग है। अनुवाद कोई मशीनी या तकनीकी काम भर नहीं, बल्कि एक बारीक, संवेदनशील और बौद्धिक कला है। जब कोई अनुवादक किसी किताब, कविता या करार का अनुवाद करता है, तो उसे मूल लेखक का विचार, उसके पीछे की भावना, स्थानीय संस्कृति का संदर्भ और मूल भाषा की आत्मा संभालकर रखनी पड़ती है। असली हुनर यही है कि मूल अर्थ को जरा भी चोट पहुंचाए बिना संदेश दूसरी भाषा के पाठक तक आसानी से पहुंचे।

साहित्य की बात करें तो अगर दुनिया में अनुवादक न होते, तो हमें शेक्सपियर के नाटक, लियो टॉलस्टॉय या दॉस्तोयेव्स्की के जाने-माने उपन्यास, रवींद्रनाथ टैगोर की 'गीतांजली' या भारतीय महाकाव्य दूसरी भाषाओं में पढ़ने को नहीं मिलते। दुनिया भर का साहित्य हम तक पहुंचाने और अपना साहित्य दुनिया के नक्शे पर ले जाने का काम अनुवादक दिन-रात करते हैं। वे भाषा की दीवारें पार कराके पाठकों को किसी भी संस्कृति का अनुभव लेने का मौका देते हैं।

आज की दुनिया 'ग्लोबल विलेज' बन चुकी है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, वैश्विक राजनीति, कूटनीति और विज्ञान के क्षेत्र में अनुवाद की भूमिका बेहद अहम हो गई है। दो देशों के बीच व्यापारिक करार हों, विश्व स्वास्थ्य संगठन की जरूरी गाइडलाइन हों या संयुक्त राष्ट्र (UN) में शांति वार्ता, वहां मौजूद अनुवादक और दुभाषिए (Interpreters) रियल-टाइम में बातचीत की दूरी पाटते हैं। सटीक अनुवाद से दुनिया के बड़े विवाद टल सकते हैं और आपसी सहयोग बढ़ सकता है।

वैज्ञानिक और चिकित्सा शोध में भी अनुवाद का योगदान बहुत बड़ा है। किसी देश में खोजी गई जीवनरक्षक दवा या तकनीक दूसरे देशों तक पहुंचाने के लिए उसका सही अनुवाद जरूरी होता है। पढ़ाई-लिखाई में भी दुनिया भर का ज्ञान विद्यार्थियों तक उनकी मातृभाषा में पहुंचाने के लिए अनुवादक दिन-रात मेहनत करते हैं।

आज गूगल ट्रांसलेट या तरह-तरह के AI टूल्स से एक सेकंड में अनुवाद हो जाता है। फिर भी तकनीक कितनी भी आगे बढ़ जाए, इंसानी अनुवादकों की अहमियत कभी कम नहीं हो सकती। AI टूल्स शब्दों का सीधा अनुवाद कर सकते हैं, लेकिन इंसानी मन की भावना, मजाक, तंज, सांस्कृतिक संदर्भ और दार्शनिक गहराई समझने की क्षमता सिर्फ इंसानी समझ में है। इसीलिए डिजिटल दौर में भी इंसानी छुअन वाला अनुवाद ज्यादा भरोसेमंद और जिंदा माना जाता है।

अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस सिर्फ भाषा विशेषज्ञों का उत्सव नहीं है। यह हर भाषा बोलने वाले को अपनी मातृभाषा पर गर्व करने और दूसरी भाषाओं का सम्मान करने की प्रेरणा देता है। कई भाषाओं को बढ़ावा देने से समाज में शांति, भाईचारा और सबको साथ लेकर चलने की भावना बढ़ती है। दुनिया को करीब लाने वाले, ज्ञान का लेन-देन आसान बनाने वाले और भाषाओं के जरिए इंसानियत को जोड़ने वाले सभी अनुवादकों और भाषा विशेषज्ञों को इस दिन पर सलाम।

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