26 सितंबर: परमाणु हथियारों के खतरे को लेकर संयुक्त राष्ट्र का दिन क्यों मनाया जाता है
दुनिया भर में बढ़ते तनाव के बीच परमाणु हथियारों के पूर्ण उन्मूलन का अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया गया, जानिए इसका इतिहास और मकसद
आज की दुनिया भले ही टेक्नोलॉजी और साइंस में तेजी से आगे बढ़ रही हो, लेकिन दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे तनाव और जंग के साये की वजह से परमाणु हथियारों का खतरा इंसानियत के सामने बड़े पैमाने पर खड़ा है। दुनिया की शांति, सुरक्षा और स्थिरता के लिए यह बहुत जरूरी हो गया है कि सभी देश परमाणु हथियारों को छोड़ दें। इसी गंभीर खतरे के बारे में पूरी दुनिया को जागरूक करने और परमाणु हथियारों से मुक्त दुनिया बनाने के मकसद से हर साल 26 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'परमाणु हथियारों के पूर्ण उन्मूलन का अंतरराष्ट्रीय दिवस' मनाया जाता है।
यह दिन याद दिलाता है कि जब तक दुनिया में कहीं भी परमाणु हथियार मौजूद हैं, तब तक इंसानियत और हमारी धरती का वजूद सुरक्षित नहीं रह सकता। परमाणु हथियारों का जखीरा जमा करना या जंग में इनके इस्तेमाल की धमकी देना सिर्फ सैन्य होड़ नहीं, बल्कि लाखों बेगुनाह लोगों की जिंदगी के साथ खेला जा रहा एक बेहद खतरनाक खेल है।
परमाणु हथियार इंसान द्वारा बनाए गए अब तक के सबसे खतरनाक और जानलेवा हथियार माने जाते हैं। इतिहास गवाह है कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर हुए परमाणु बम हमले ने एक ही पल में लाखों जिंदगियां तबाह कर दी थीं। उस भयानक हादसे के शारीरिक, मानसिक और जेनेटिक असर वहां की पीढ़ियों को दशकों तक झेलने पड़े।
आज के दौर में बनाए गए परमाणु हथियार उस वक्त के बमों से कहीं ज्यादा ताकतवर और खतरनाक हैं। अगर आज किसी जंग में इन हथियारों का इस्तेमाल हुआ, तो चंद सेकंडों में पूरे के पूरे शहर तबाह हो जाएंगे। करोड़ों लोगों की मौत होगी और रेडिएशन की वजह से हवा, पानी, जमीन और पूरी फूड चेन दूषित हो जाएगी। इससे पैदा होने वाला 'न्यूक्लियर विंटर' जैसा भयानक मौसमी बदलाव पूरी धरती पर खेती और प्राकृतिक जीवसृष्टि को बर्बाद कर सकता है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2013 में एक खास प्रस्ताव के जरिए 26 सितंबर के दिन को 'परमाणु हथियारों के पूर्ण उन्मूलन का अंतरराष्ट्रीय दिवस' घोषित किया था। इसके पीछे मकसद यह था कि सभी सदस्य देशों को साथ लाकर परमाणु हथियारों से मुक्त दुनिया बनाने के लिए ठोस नीतियां तैयार की जाएं। इस दिन संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय और दुनिया भर के अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हाई-लेवल कॉन्फ्रेंस, सेमिनार और नीतिगत चर्चाएं आयोजित की जाती हैं। इन पहलों के जरिए बड़ी ताकतों और परमाणु हथियार रखने वाले देशों पर Non-Proliferation Treaty (NPT) और Treaty on the Prohibition of Nuclear Weapons (TPNW) जैसे अंतरराष्ट्रीय समझौतों का पालन करने के लिए दबाव बनाया जाता है। दुनिया में परमाणु हथियारों का स्टॉक कम करना, नए परमाणु परीक्षणों पर रोक लगाना और धीरे-धीरे सारे परमाणु हथियार पूरी तरह खत्म करना, इस पर दुनिया के नेताओं का फोकस रहता है।
परमाणु हथियारों को खत्म करने का लक्ष्य सिर्फ नेताओं या सैन्य अधिकारियों तक सीमित नहीं है, इसमें दुनिया के हर नागरिक की भागीदारी अहम है। इस मौके पर कई एनजीओ, शिक्षण संस्थान और शांति के लिए काम करने वाले संगठनों की तरफ से रैलियां, लेक्चर, वर्कशॉप और निबंध प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं, जिनमें युवा पीढ़ी को परमाणु हथियारों के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरण से जुड़े नुकसान के बारे में बताया जाता है।
परमाणु हथियार बनाने और उनकी देखभाल पर हर साल अरबों डॉलर खर्च होते हैं। अगर यह भारी-भरकम रकम दुनिया भर में गरीबी हटाने, हेल्थ सुविधाओं, शिक्षा और क्लाइमेट चेंज जैसी गंभीर समस्याओं को सुलझाने में लगाई जाए, तो पूरी दुनिया समृद्ध हो सकती है। यही वजह है कि 26 सितंबर का दिन याद दिलाता है कि शांति, अहिंसा और आपसी सहयोग से ही हम आने वाली पीढ़ी को एक सुरक्षित और परमाणु हथियारों से मुक्त धरती सौंप सकते हैं।