२३ साल बाद इराक से पूरी तरह लौटेगी अमेरिकी फौज, कुर्दों की बढ़ी फिक्र
अमेरिका अब इराक से अपनी फौज पूरी तरह वापस बुलाने जा रहा है। पूरे २३ साल बाद अमेरिकी सैनिक इराक छोड़कर अपने देश लौटेंगे। दुनिया की राजनीति में इसे एक बड़ी घटना माना जा रहा है।
इससे पहले अमेरिका अफगानिस्तान से भी इसी तरह जल्दी में लौट चुका है। उस वक्त के सारे नज़ारे पूरी दुनिया ने देखे थे। राजनीति के जानकारों का कहना है कि इराक की जनता का बढ़ता दबाव और मध्य पूर्व का संघर्ष इस वापसी की मुख्य वजह हैं।
इस फैसले से इराक में एक तरफ खुशी है, तो दूसरी तरफ कुर्द लोगों की टेंशन बढ़ गई है। मिली जानकारी के मुताबिक जैसे अमेरिका के इराक में आने से कुछ लोगों को राहत मिली थी, वैसे ही उसके लौटने से कुछ लोग नाराज़ और दुखी भी होंगे।
अब ज़रा इतिहास देखें। २००३ में सद्दाम हुसैन पर जैविक हथियार रखने का आरोप लगाकर अमेरिका इराक में घुसा था। ईरान और अफगानिस्तान में पहाड़ हैं, इसलिए अमेरिका वहां जीत नहीं पाया। इराक में बड़े पहाड़ नहीं हैं, ज्यादातर सीधा समतल इलाका है, इसलिए सद्दाम को हराना अमेरिका के लिए मुमकिन हुआ। इराक के कुछ राजनीतिक लोगों को साथ लेकर अमेरिका ने सत्ता बदल दी।
सद्दाम को फांसी दे दी गई। लेकिन कुछ वक्त बाद इराक में इस्लामी विचारधारा के लोग इकट्ठा होकर (ISIS) अमेरिका से लड़ने लगे। साथ ही अमेरिका ने इराक सरकार की फौज को ट्रेनिंग देना शुरू किया और उसे हथियार भी दिए। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों की राय है कि सद्दाम हुसैन अमेरिका के दबदबे को चुनौती दे रहे थे और उसके नियम नहीं मानते थे। इराक के तेल भंडारों पर अमेरिका का कंट्रोल रहेगा या नहीं, इसी वजह से उन्हें हटाया गया, ऐसी भी राय है।
अब कुर्दों की बात। कुर्द मध्य पूर्व का बड़ी आबादी वाला जातीय समुदाय है। वे मुख्य रूप से इराक, तुर्की, ईरान और सीरिया, इन चार देशों में रहते हैं। उनकी अपनी अलग भाषा, संस्कृति और राष्ट्रीय पहचान है, मगर उनका अपना कोई संप्रभु देश नहीं है। इराक में अमेरिका की मौजूदगी से उन्हें बहुत बड़ा सहारा मिलता था।
वहां अमेरिका कुर्दों का पाठीराखा था। उसके जाने से इराकी इस्लामी गुटों और कुर्दों की लड़ाई में कुर्द कमज़ोर पड़ सकते हैं। इसीलिए इराक में एक तरफ खुशी है तो दूसरी तरफ सन्नाटा पसरा है।
अमेरिका फौज क्यों हटा रहा है, इसकी वजहें भी बताई जा रही हैं। इराक की फौज को काफी ट्रेनिंग और हुनर सिखाने के बाद अब अमेरिका को वहां रुकने की ज्यादा ज़रूरत नहीं लगती। मध्य पूर्व में, खासकर ईरान के साथ बढ़ता संघर्ष भी इसकी एक अहम वजह बताया जा रहा है। वापसी का फैसला ज्यो बाइडन के राष्ट्रपति रहते ही तय हो गया था। बाद में ट्रम्प के सत्ता में आने पर उन्होंने उस प्रस्ताव को बरकरार रखा और उसे लागू कर दिया।