2050 तक डेटा सेंटर पर 30 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा खर्च का अंदाजा
AI के बढ़ते इस्तेमाल से डेटा सेंटर की मांग तेजी से बढ़ी है। अनुमान है कि 2050 तक दुनिया भर में इन पर पूंजीगत खर्च 30 ट्रिलियन डॉलर से ऊपर जा सकता है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI का इस्तेमाल बढ़ने से दुनिया भर के टेक्नॉलॉजी सेक्टर में निवेश की बड़ी लहर आई है। AI मॉडल चलाने के लिए सर्वर, आधुनिक चिप्स, डेटा स्टोरेज और भारी कंप्यूटिंग क्षमता चाहिए, इसलिए डेटा सेंटर की मांग तेजी से बढ़ रही है।
इसी पृष्ठभूमि में अंदाजा लगाया गया है कि 2050 तक दुनिया भर में डेटा सेंटर पर कुल पूंजीगत खर्च 30 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा हो सकता है। लेकिन इतने बड़े निवेश के बदले उम्मीद के मुताबिक रिटर्न मिलेगा या नहीं, यह सवाल अब अर्थशास्त्रियों और उद्योग जगत में चर्चा का मुद्दा बन गया है।
AI तकनीक का इस्तेमाल चैटबॉट से लेकर इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन, सॉफ्टवेयर, स्वास्थ्य सेवा, गाड़ी उद्योग और रक्षा क्षेत्र तक फैल रहा है। AI मॉडल को बड़े पैमाने पर डेटा प्रोसेस करना पड़ता है, जिसके लिए ताकतवर GPU और दूसरे कंप्यूटिंग उपकरण लगते हैं। इसी वजह से बड़ी टेक्नॉलॉजी कंपनियां दुनिया भर में नए डेटा सेंटर खड़े कर रही हैं।
इस ढांचे पर खर्च सिर्फ इमारतों का नहीं होता। सर्वर, GPU, मेमरी, नेटवर्किंग उपकरण, स्टोरेज, कूलिंग सिस्टम और बिजली सप्लाई पर भी भारी रकम लगती है। खास बात यह है कि ये उपकरण कुछ सालों बाद अपग्रेड करने पड़ते हैं। यानी डेटा सेंटर पर निवेश एक बार का खर्च नहीं, बल्कि लंबे समय तक चलने वाली प्रक्रिया होगी।
अगर AI का विस्तार जारी रहा, तो आने वाले कुछ दशकों में डेटा सेंटर के लिए जरूरी कंप्यूटिंग क्षमता कई गुना बढ़ सकती है। इसके लिए नए डेटा सेंटर बनाने के साथ पुराने केंद्रों में भी आधुनिक उपकरण लगाने होंगे।
बिजली की मांग भी बड़े पैमाने पर बढ़ेगी। AI डेटा सेंटर को लगातार और बड़ी क्षमता की बिजली सप्लाई चाहिए। इसलिए बिजली उत्पादन, पावर ग्रिड, ट्रांसमिशन और कूलिंग व्यवस्था पर भी अतिरिक्त निवेश करना पड़ेगा। नतीजा यह कि AI का विस्तार सिर्फ टेक्नॉलॉजी सेक्टर तक सीमित नहीं रहेगा, ऊर्जा और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र पर भी असर डाल सकता है।
AI में पैसा झोंका जा रहा है, पर उससे मिलने वाला आर्थिक रिटर्न पक्का नहीं है। फिलहाल यह निवेश इस उम्मीद पर हो रहा है कि AI से कंपनियों की उत्पादकता काफी बढ़ेगी, काम की रफ्तार बढ़ेगी और नए बाजार बनेंगे। मगर इतनी व्यापक उत्पादकता बढ़ोतरी असल अर्थव्यवस्था में कितनी तेजी से दिखेगी, इस पर अब भी अनिश्चितता है।
अगर AI के जरिए कंपनियों को उम्मीद के मुताबिक कमाई और मुनाफा नहीं मिला, तो डेटा सेंटर पर भारी खर्च का आर्थिक गणित बदल सकता है। इसलिए आगे AI की असली परीक्षा सिर्फ इस बात की नहीं होगी कि तकनीक कितनी तेजी से विकसित होती है, बल्कि इस बात की भी होगी कि इससे असल में कितनी उत्पादकता, कमाई और मुनाफा बनता है। 2050 तक का 30 ट्रिलियन डॉलर का संभावित खर्च इसलिए दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा निवेश भी हो सकता है और उतनी ही बड़ी आर्थिक चुनौती भी।