विधान परिषद नतीजे: आनंद परांजपे बोले, भाजप पहले अपनी हार पर आत्मचिंतन करे
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शिवसेना प्रवक्ता आनंद परांजपे ने कहा कि हार का ठीकरा शिवसेना पर फोड़ना गलत है और महायुति के तीनों दल नतीजों पर आत्मचिंतन करें।
विधान परिषद चुनाव के नतीजों के बाद महायुति के भीतर आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं। शिवसेना के प्रवक्ता आनंद परांजपे ने कहा कि भाजप की ओर से शिवसेना पर जो इल्जाम लगाए जा रहे हैं, वे बेबुनियाद हैं। उनके मुताबिक तीनों पार्टियों को इस नतीजे पर आत्मचिंतन करना चाहिए।
परांजपे ने कहा कि छत्रपति संभाजीनगर और अमरावती में भाजप के नेताओं के रुख की वजह से महायुति को नुकसान उठाना पड़ा। उनका कहना था कि पुणे में कार्यकर्ताओं की जोरदार मांग थी कि दो में से एक सीट शिवसेना लड़े। पार्टी का रुख भी पहले दिन से यही था कि पुणे पदवीधर और पुणे शिक्षक में से एक सीट शिवसेना को मिले।
परांजपे के अनुसार महायुति की समन्वय समिति की बैठक में चार सीटों पर फैसले हुए थे। इसके बावजूद भाजप ने पुणे पदवीधर, पुणे शिक्षक और नागपुर पदवीधर, इन तीन सीटों पर उम्मीदवार घोषित कर दिए। शिवसेना ने पुणे शिक्षक सीट पर अपने अधिकृत उम्मीदवार मंगेश चिवटे का नामांकन वापस ले लिया। परांजपे ने यह भी कहा कि पुणे के दोनों क्षेत्रों में भाजप का कोई विधायक नहीं था, इसलिए इन सीटों पर भाजप का दावा कितना ठीक था, इस पर सोचा जाना चाहिए।
पुणे पदवीधर के उम्मीदवार के बारे में परांजपे ने कहा कि भाजप ने जिसे टिकट दिया, वह पार्टी का सदस्य तक नहीं था। उनका कहना था कि अगर भाजप पार्टी के लिए बरसों काम करने वाले किसी वफादार कार्यकर्ता को उतारती, तो कार्यकर्ताओं और वोटरों में जोश पैदा होता। बाहर का उम्मीदवार देने से भाजप के अपने कार्यकर्ताओं में नाराजगी फैली। परांजपे के शब्दों में, इस उम्मीदवार को शिवसेना ने नहीं हराया, भाजप के अपने कार्यकर्ताओं और मतदाताओं ने उसे नकार दिया।
अमरावती शिक्षक सीट के बारे में परांजपे ने कहा कि यह सीट शिवसेना के पास थी, फिर भी भाजप से जुड़े तीन उम्मीदवार मैदान में थे। ये थे भाजप के सांसद अनिल बोंडे की बहन संगीता शिंदे, चंद्रशेखर भुयार और डॉ. पवार, जो प्रचार में सक्रिय रहे। परांजपे ने आरोप लगाया कि भाजप ने बागियों पर कार्रवाई जरूर की, लेकिन चुनाव के दौरान वे सक्रिय थे। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इसके बावजूद शिवसेना के उम्मीदवार किरण सरनाईक जीते।
मराठवाड़ा पदवीधर को लेकर परांजपे ने कहा कि राष्ट्रवादी कांग्रेस के उम्मीदवार सतीश चव्हाण ने विधानसभा चुनाव में भाजप के उम्मीदवार प्रशांत बंब के खिलाफ चुनाव लड़ा था। इसलिए उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि भाजप प्रवक्ता नवनाथ बन यह पता लगाएं कि इस चुनाव में प्रशांत बंब ने आखिर किसका प्रचार किया। नागपुर के बारे में परांजपे ने कहा कि भाजप के पूर्व विधायक अनिल सोले ने बगावत की थी और अपना नामांकन वापस नहीं लिया था। चुनाव से पहले उन्होंने समर्थन दिया, फिर भी उनकी बगावत का असर नतीजे पर पड़ा।
परांजपे ने सलाह दी कि खुद को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बताने वाली भाजप मित्र पार्टियों पर ठीकरा फोड़ने के बजाय अपनी चुनावी रणनीति और अंदरूनी नाराजगी पर आत्मचिंतन करे। उनके मुताबिक पांच-शून्य के नतीजे की उम्मीद थी, पर महायुति को सिर्फ दो सीटों पर जीत मिली। उन्होंने कहा कि हमने भाजप पर आरोप नहीं लगाए और आगे भी नहीं लगाएंगे, लेकिन भाजप को भी शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस को भरोसे में लेकर तालमेल से काम करना चाहिए।
परांजपे ने कहा कि महायुति की एकजुटता बनाए रखना सभी सहयोगी दलों की जिम्मेदारी है और इसके लिए आपसी भरोसा, सम्मान और तालमेल जरूरी है।
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